आज फिर 26 जवान नक्सलियों की भेंट चढ़ गये हैं.... घात लगाये बैठे इन उपद्रवियों नें ना कितनी मांओं से उनका बेटी ..बहनों से भाई ..बच्चों से उनके पिता...औऱ कितनी ही सुहागिनों की मांग उजाड डाली है........कुछ अशांत दिमाग के चलते शोषण मुक्त समाज की अवधारणा वाले इस नक्सल आंदोलन ने
लोगों को वेबज़ह परेशान करने और आमदनी का एक ज़रिया मात्र बनाकर रख दिया
है। नक्सलवाद का मूल सिंद्धात बदलकर अब सिर्फ हिंसा तक केंद्रित रह गया है।
इनका संघर्ष सर्वहिताय से हटकर राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र बनकर
रह गया है। ..इन उपद्रवियों नें आज फिर ना कितनों मांओ से उनके बेटे छीन लियें हैं ना जाने कितने बच्चें आनाथ हो गये....ना कितनों सुहागिनों का सिंदुर पुछ गया....अरे ओ मामूली चीजों के देवता की उपासक क्या इन शहीदों में तुम्हें कोई अपना सगा नज़र नहीं आता है...क्या तुम्हारे कानों में इन शहीदो की विधवाओं की चीखें इनका रूदन नहीं टकरा रहा है...या महिमामंड़ित महत्वकाक्षां के चलते अब तुम निष्ठुर हो गई हो....मैं आप सब से पूछता हूं कौन जिम्मेदार है इन मांओ ,बहनो.बेटो के आंखों के आसूंओं का जिम्मेदार क्या सिर्फ सरकार या फिर अरूधती राय जैसे महत्वकाँक्षी
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Wednesday, June 30, 2010
Tuesday, March 2, 2010
नक्सलवाद और मीडिया
छत्तीसगढ़ के एक प्रादेशिक चैनल में काम करते हुए एक बार नक्सलियों के विचारों और कार्यशैली को जानने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान नक्सलियों ने तत्कालीन गृहमंत्री को जान से मारने को लिये एक धमकी भरा पत्र लिखा था जिसे सबसे पहले मीडिया मे हमारे चैनल ने दिखाया यह दिन की सबसे बड़ी ख़बर तो थी ही लेकिन इस ख़बर ने मुझे इस बात को सोचने में मज़बूर कर दिया कि आखिर इन नक्सलियों की मांगे इस तरह से क्यों हैं औऱ मीडिया ने सामाजिक पहलू से इस पूरी बिरदारी और इनकी जायज या नाजायज मांगों के बीच क्या भूमिका निभाई। नक्सलवाद कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का वो अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्यूनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने १९६७ मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। इन कामरेडों का मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और परिणामस्वरुप कृषितंत्र पर दबदबा हो गया है; और यह सिर्फ़ सशस्त्र क्रांति से ही खत्म किया जा सकता है। १९६७ में "नक्सलवादियों" ने कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग हो गये और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। १९७१ में मजूमदार की मौत के बाद नक्सलवाद कई शाखाओं में बट गया और अलग अलग पार्टियां बना कर काम करने लगा । लेकिन जैसे जैसे नक्सलवादियों का प्रभाव समाज में बढने लगा इनके आंदोलन का मूल सिंद्धात भी बदलता गया वर्तमान में नक्सलबाद सिर्फ एक भटका हुआ आंदोलन मात्र बनकर रह गया है। कुछ अशांत दिमाग के चलते शोषण मुक्त समाज की अवधारणा वाले इस आंदोलन ने लोगों को वेबज़ह परेशान करने और आमदनी का एक ज़रिया मात्र बनाकर रख दिया है। नक्सलवाद का मूल सिंद्धात बदलकर अब सिर्फ हिंसा तक केंद्रित रह गया है। इनका संघर्ष सर्वहिताय से हटकर राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र बनकर रह गया है। ....रही बात मीडिया की तो नक्सवाद से जुड़ी हर ख़बर को लेकर उत्साहित मीडिया ने कभी भी इस बात को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई की नक्सलवादियों से जुडी जिन ख़बरों को वे लोगों के सामने ला रहे हैं उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव क्या पडेगा ? आम लोगों के बीच इन ख़बरों को लेकर किस तरह का माहौल पैदा होगा,सबसे पहले ब्रेकिंग करने की होड में हम कई बार यह भी भूल जाते हैं निरकुंश हो चुके इन उपद्रविय़ों की इस तरह की खबरों को दिखाने के चक्कर में कहीं ना कहीं हमने नक्सलियों के और समाज के बीच एक आतंक का माहौल ही पैदा किया है। छत्तीसगढ़ में कई साल तक काम करते हुए कई बार ऐसे मौके आये जब यह स्थिति आम रही। इन ख़बरों के पीछे भागते हुए हम पागलों की तरह पुलिस के दिये बयानों में यकीन करते रहे, कई बार यह बात भी गौर करने आई पुलिस द्वारा पकडे गये तमाम लोगों के पीछे यह जोड दिया जाता है कि गिरफ्तार व्यक्ति नक्सली गतिविधियों लिप्त था या फिर इसके तार नक्सलियों से जुड़े हैं जबकि कई बार तो हकीकत इससे कोसों दूर रही है यहां पर यह कहना कदाचित् अतिश्योक्ति नहीं होगी कि नक्सलियों का इस्तेमाल कुछ हद तक राजनैतिक स्वार्थों के लिए भी होता रहा है। प्रदेश के कई हिस्सों में चुनावों के दौरान इनका इस्तेमाल भी बडे पैमाने पर किया जाता रहा है। मुझे एक बात औऱ समझ में नहीं आई कि आखिर किसी साहित्य को पढना या किसी विचार को पढ़ना किस हद तक अपराध की श्रेणी में आता है, आखिर हमने भी तो स्कूल और कालेज के दौरान कई विचारधाराओं को पढ़ा और काफी हद तक उन्हें आत्मसात् भी किया है। मीडिया ने हमेशा से नक्सली गतिविधियों को ख़बरों का केंद्र बिंदु माना लेकिन इन नक्सलियों के परिवर्तित विचारधारा को जानने का प्रयास आज भी अधूरा है,राजनैतिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किये जा रहे नक्सलियों की तरफ किसी का ध्यान आज तक क्यों नहीं गया यह एक अलग से शोध करने का बिंदु हो सकता है। कई बार तो हम यह सोचना भी भूल जाते हैं कि नक्सलवाद के आरोप में आज तक जितनी भी गिरफ्तारियां हुई उनके पीछे की वजह क्या है,हम यह भी भूल जाते हैं किसी जनसमुदाय का यह आंदोलन किसी राजनैतिक दबाब के चलते तो नहीं हुआ है बात इतनी सी ही है कि इन आंदोलनों के पीछे कई बार कई तरह की राजनैतिक साजिशें भी होती है।मीडिया का काम नक्सल नामक इस मुहिम को सिर्फ ख़बरों के लिए ना होकर समाज की मुख्य धारा से भटके इन क्रांतिकारियों ( अगर मूल सिंद्धातों की दुहाई ना दे तो) की निराशाकी वजह खोजना भी होना चाहिए।आखिर समाज के इस चौथे स्तंभ का कुछ जिम्मेदारियां भी तो है जिसमें समाज को समाज का असली चेहरा भी दिखाना है....
केशव आचार्य
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