नदी घरोंदे खेल -खिलौने बचपन अच्छे लगते थे
वो भी कैसे अच्छे दिन थे धूप के जंगल हंसते थे
मीलों फैले सन्नाटे,जादू ढलती शामों का
रस्ते रस्ते पगडंडी के रह रह घूंघरू बजते थे
दिन कोई बंजारों जैसे आते जाते बस्ती में
रातें जलें अलावों जैसी सुख दुख भीगे किस्से थे
ऋतुएं आंधी पानी जैसी मौसम कई बुजुर्गों से
कुशलक्षेम आते जाते की अक्सर पूछा करते थे
रिश्तों की अपनी परिभाषा पानी था संबंधों का
भोले भाले सीधे साधे लोग आईनों जैसे थे
सबके अपने अपने बोझे एक सोच थी एक सफर
छोटे बड़े पराए अपने सभी एक से दिखते थे
Thursday, July 29, 2010
Sunday, July 4, 2010
क्या आप अरुंधती राय को जानते हैं?
आप अरुंधती राय को जानते हैं? आपमें से कई लोग कम से कम इतना जरूर जानते होंगे कि वह भारत की प्रसिद्ध लेखिका व समाजसेविका हैं। पर क्या आप यह जानते हैं कि उन्हें खुद को भारतीय कहने में शर्म आती है। हैरानी हो रही है न, पर यह सच है। यही नहीं, वह भारतविरोधी मुहिम भी चला रखी है, जिसमें उनका साथ दे रहे हैं कई एनआरआई भारतीय। मुहिम रूपी इस राष्ट्रविरोधी दुष्साहस का मकसद है, भारत से कश्मीर को आजाद कराना। जब पूरा देश 'नक्सलियो की इन हरकतों से परेशान है तब एक रैली में अरुंधती राय बोल रही थी,‘ "न बददिमागो का ये कदमठीक है"
अपने देश की सहनशक्ति वाकई में असीम है कि एक तरफ, अपने ही देश के मतीभ्रष्ट नौजवानों का संगठन सिमी आईएसआई के इशारे पर देश में आतंकी वारदात को अंजाम दे रहा है और इंडियन मुजाहीद्दीन के नाम उसकी जिम्मेदारी भी ले रहा है। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाने लिए अपने ही देश के राजनेता सिमी के रहनुमा बने फिर रहे हैं। पुलिस की खुफिया शाखा और एसटीएफ के सूत्रों की मानें तो ऐसे आतंकियों को पनाह देने वालों में मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात व उत्तर प्रदेश के कई राजनेता और उद्योगपति शामिल हैं। राजनेताओं में कांग्रेस, भाजपा के अलावा कई क्षेत्रीय दलों के बड़े-छोटे पदाधिकारी भी शामिल हैं।
वाह! धन्य हैं भारतमाता और उसकी सहनशीलता, जिसकी कोख से पैदा लेकर, खून-पसीने से हासिल आजाद भारत में पल-बढ़कर कुछ लोग उसी मां की अस्मिता व अस्तित्व के खिलाफ वातावरण में जहर घोल रहे हैं। जिस अरुंधती राय व राजनेताओं पर भारत की जनता ने विश्वास किया और उन्हें देश और समाज के सेवक का दर्जा व सम्मान दिया, वे भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ या कहें भारत के सिरमौर कश्मीर को देश के नक्शे से मिटाने की खुलेआम पैरवी करने लगे हैं। एहसानफरामौशी का आलम यह है कि अरुंधती राय की अगुवाई में अमेरिका और यूरोप के तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ब्रिगेड तैयार की गई है, जिसमें अधिकतर एनआरआई भारतीय शामिल हैं। इस ब्रिगेड ने कश्मीर के अलगाववादियों की कट्टरवादी दलीलों का समर्थन करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत विरोधी एक याचिका दायर की है। याचिका में संयुक्त राष्ट्र को जम्मू-कश्मीर में मानवता पर संकट से निपटने के लिए हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई गई है। याचिका में कश्मीर में पिछले माह मुसलमानों पर हुए हमलों पर चिंता व्यक्त की गई, जबकि 1989-90 में चार लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को घर-बार छोड़कर कश्मीर से भागने पर विवश करने की घटना का जिक्र तक नहीं किया गया है। शायद, अरुंधती राय ब्रिगेड के मानवाधिकार के दायरे में कश्मीरी पंडितों के बेघर होने का दर्द नहीं आता। खैर, याचिका में यह भी कहा गया है कि जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को तबाह किया जा रहा है। और यह भी कि 1989 से कश्मीर में सशस्त्र स्वतंत्रता आंदोलन चल रहे हैं, जिन्हें कुचलने के लिए भारत की कार्रवाइयों से मानवाधिकार हनन की गंभीर घटनाएं हो रही हैं।
कैसी विडंबना है, इतना गंभीर आरोप लगाने वाले तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता इसी भूमि की पैदाईश हैं। क्या कभी आपने सहज भाव से भारत के नक्शे की कल्पना कश्मीर को अलग करके की है? क्या हमारे ही पूर्वजों ने इस देश की संप्रभुता और आजादी की खातिर अनगिनत कुर्बानियां दी थीं और गुलाम भारत को अपने खून से सींच कर अहलेचमन बनाया था? कल तक तो पाकिस्तान के भेजे आतंकी हमारे देश की संप्रभुता पर हमला कर रहे थे, अब तो अपने ही घर के लोग और वह भी जाने-माने लोग, स्वार्थ में इस कदर वशीभूत हो चुके हैं कि अपनी ही मां से गद्दारी करते उनकी रूह तक नहीं कांप रही हैं...
अपने देश की सहनशक्ति वाकई में असीम है कि एक तरफ, अपने ही देश के मतीभ्रष्ट नौजवानों का संगठन सिमी आईएसआई के इशारे पर देश में आतंकी वारदात को अंजाम दे रहा है और इंडियन मुजाहीद्दीन के नाम उसकी जिम्मेदारी भी ले रहा है। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाने लिए अपने ही देश के राजनेता सिमी के रहनुमा बने फिर रहे हैं। पुलिस की खुफिया शाखा और एसटीएफ के सूत्रों की मानें तो ऐसे आतंकियों को पनाह देने वालों में मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात व उत्तर प्रदेश के कई राजनेता और उद्योगपति शामिल हैं। राजनेताओं में कांग्रेस, भाजपा के अलावा कई क्षेत्रीय दलों के बड़े-छोटे पदाधिकारी भी शामिल हैं।
वाह! धन्य हैं भारतमाता और उसकी सहनशीलता, जिसकी कोख से पैदा लेकर, खून-पसीने से हासिल आजाद भारत में पल-बढ़कर कुछ लोग उसी मां की अस्मिता व अस्तित्व के खिलाफ वातावरण में जहर घोल रहे हैं। जिस अरुंधती राय व राजनेताओं पर भारत की जनता ने विश्वास किया और उन्हें देश और समाज के सेवक का दर्जा व सम्मान दिया, वे भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ या कहें भारत के सिरमौर कश्मीर को देश के नक्शे से मिटाने की खुलेआम पैरवी करने लगे हैं। एहसानफरामौशी का आलम यह है कि अरुंधती राय की अगुवाई में अमेरिका और यूरोप के तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ब्रिगेड तैयार की गई है, जिसमें अधिकतर एनआरआई भारतीय शामिल हैं। इस ब्रिगेड ने कश्मीर के अलगाववादियों की कट्टरवादी दलीलों का समर्थन करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत विरोधी एक याचिका दायर की है। याचिका में संयुक्त राष्ट्र को जम्मू-कश्मीर में मानवता पर संकट से निपटने के लिए हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई गई है। याचिका में कश्मीर में पिछले माह मुसलमानों पर हुए हमलों पर चिंता व्यक्त की गई, जबकि 1989-90 में चार लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को घर-बार छोड़कर कश्मीर से भागने पर विवश करने की घटना का जिक्र तक नहीं किया गया है। शायद, अरुंधती राय ब्रिगेड के मानवाधिकार के दायरे में कश्मीरी पंडितों के बेघर होने का दर्द नहीं आता। खैर, याचिका में यह भी कहा गया है कि जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को तबाह किया जा रहा है। और यह भी कि 1989 से कश्मीर में सशस्त्र स्वतंत्रता आंदोलन चल रहे हैं, जिन्हें कुचलने के लिए भारत की कार्रवाइयों से मानवाधिकार हनन की गंभीर घटनाएं हो रही हैं।
कैसी विडंबना है, इतना गंभीर आरोप लगाने वाले तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता इसी भूमि की पैदाईश हैं। क्या कभी आपने सहज भाव से भारत के नक्शे की कल्पना कश्मीर को अलग करके की है? क्या हमारे ही पूर्वजों ने इस देश की संप्रभुता और आजादी की खातिर अनगिनत कुर्बानियां दी थीं और गुलाम भारत को अपने खून से सींच कर अहलेचमन बनाया था? कल तक तो पाकिस्तान के भेजे आतंकी हमारे देश की संप्रभुता पर हमला कर रहे थे, अब तो अपने ही घर के लोग और वह भी जाने-माने लोग, स्वार्थ में इस कदर वशीभूत हो चुके हैं कि अपनी ही मां से गद्दारी करते उनकी रूह तक नहीं कांप रही हैं...
महंगाई
मरतोड़ महंगाई ने आम आदमी के लिए मुसीबतंे खड़ी कर दी है। उनका जीना मुहाल कर दिया है। कुछ दिनों के अंतराल में खाद्य तेलों के दाम में वृद्धि हो रही है। इस दौरान फल एवं सब्जियों, अनाज और तेल जैसी जरूरी चीजों की कीमतें अभी भी पिछले साल के मुकाबले अघिक है।
| इतनी बढी महंगाई ? | ||
| खाद्य पदार्थ | वर्तमान कीमत(रूपए) | कीमत एक वर्ष पूर्व(रू.) |
| दालें | 50 से 65 | 45 से 50 |
| सरसों तेल | 55 से 65 | 48 से 50 |
| चीनी | 27 | 21 से 22 |
| आटा | 16 | 14 |
| देशी घी | 230 | 195 |
| फल सेब | 100 | 50 से 60 |
| अनार | 80 | 50 |
Wednesday, June 30, 2010
अरूधंती राय अब तो कुछ शर्म करों.....जवानों हम शर्मिदां हैं.....
आज फिर 26 जवान नक्सलियों की भेंट चढ़ गये हैं.... घात लगाये बैठे इन उपद्रवियों नें ना कितनी मांओं से उनका बेटी ..बहनों से भाई ..बच्चों से उनके पिता...औऱ कितनी ही सुहागिनों की मांग उजाड डाली है........कुछ अशांत दिमाग के चलते शोषण मुक्त समाज की अवधारणा वाले इस नक्सल आंदोलन ने
लोगों को वेबज़ह परेशान करने और आमदनी का एक ज़रिया मात्र बनाकर रख दिया
है। नक्सलवाद का मूल सिंद्धात बदलकर अब सिर्फ हिंसा तक केंद्रित रह गया है।
इनका संघर्ष सर्वहिताय से हटकर राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र बनकर
रह गया है। ..इन उपद्रवियों नें आज फिर ना कितनों मांओ से उनके बेटे छीन लियें हैं ना जाने कितने बच्चें आनाथ हो गये....ना कितनों सुहागिनों का सिंदुर पुछ गया....अरे ओ मामूली चीजों के देवता की उपासक क्या इन शहीदों में तुम्हें कोई अपना सगा नज़र नहीं आता है...क्या तुम्हारे कानों में इन शहीदो की विधवाओं की चीखें इनका रूदन नहीं टकरा रहा है...या महिमामंड़ित महत्वकाक्षां के चलते अब तुम निष्ठुर हो गई हो....मैं आप सब से पूछता हूं कौन जिम्मेदार है इन मांओ ,बहनो.बेटो के आंखों के आसूंओं का जिम्मेदार क्या सिर्फ सरकार या फिर अरूधती राय जैसे महत्वकाँक्षी
लोगों को वेबज़ह परेशान करने और आमदनी का एक ज़रिया मात्र बनाकर रख दिया
है। नक्सलवाद का मूल सिंद्धात बदलकर अब सिर्फ हिंसा तक केंद्रित रह गया है।
इनका संघर्ष सर्वहिताय से हटकर राजनैतिक सत्ता के लिए संघर्ष मात्र बनकर
रह गया है। ..इन उपद्रवियों नें आज फिर ना कितनों मांओ से उनके बेटे छीन लियें हैं ना जाने कितने बच्चें आनाथ हो गये....ना कितनों सुहागिनों का सिंदुर पुछ गया....अरे ओ मामूली चीजों के देवता की उपासक क्या इन शहीदों में तुम्हें कोई अपना सगा नज़र नहीं आता है...क्या तुम्हारे कानों में इन शहीदो की विधवाओं की चीखें इनका रूदन नहीं टकरा रहा है...या महिमामंड़ित महत्वकाक्षां के चलते अब तुम निष्ठुर हो गई हो....मैं आप सब से पूछता हूं कौन जिम्मेदार है इन मांओ ,बहनो.बेटो के आंखों के आसूंओं का जिम्मेदार क्या सिर्फ सरकार या फिर अरूधती राय जैसे महत्वकाँक्षी
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