कैसा होता जा रहा है अपना देश और कैसे हो गए हैं अपने देश के लोग। भारत रूपी समाज में कोई ऐसा समूह नहीं बचा जहां भ्रष्टाचार ने अपने पैर नहीं जमा रखे हों। किसी भी वर्ग पर आंख मूंद कर विश्वास करना दूभर हो गया है। पहले तो राजनीति बदनाम हुई, फिर पुलिस प्रशासन। पर अब कार्यपालिका, न्यायपालिका, खेल-क्रिकेट, हॉकी, गैर सरकारी/राजनीतिक संगठन, यहां तक धार्मिक संगठन भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रहे हैं।...तो क्या भ्रष्टाचार का वर्चस्व चारों तरफ इसी तरह बढ़ता रहेगा ? और क्या एक दिन भ्रष्टाचार का, आचार पर पूरी तरह से अधिपत्य हो जाएगा? तब क्या भ्रष्ट होना योग्यता होगी और ईमानदार होना अयोग्यता? यानी एक पुराने गाने की वह पंक्ति- एक दिन ऐसा कलयुग आयेगा, हंस चुगेगा दाना-तिनका, कौआ मोती खायेगा-सार्थक हो जाएगी। हम सब भ्रष्टाचार के दलदल में धंसते चले जाएंगे और सब एक-दूसरे को ठगने-लूटने की फिराक में रहेंगे। धर्म के स्थान में अधर्म होगा और साधु-संतो के स्थान पर पाखंडी। किसी को दूसरे के लिए सोचने की जरूरत नहीं होगी। स्वार्थ सबसे बड़ी नैतिकता होगी। घर के बूढ़े-बुजुर्ग जब काम करने में असर्थ हो जाएंगे तो उन्हें मरने के लिए किसी विराने में छोड़ दिया जाएगा। रिश्ते बस नाम और स्वार्थ के लिए होंगे। अंधी वासना के आगे किसी तरह के रिश्ते कोई मायने नहीं रखेंगे। लोगों को पूरी आज़ादी होगी-किसी भी तरह के कुकर्म और भ्रष्टाचार करने की।....कितना अच्छा होगा न!, हम तो ऐसा ही चाहते हैं न!
क्या आप ऐसा नहीं चाहते। तो क्या आप केवल खुद ही भ्रष्ट बने रहना चाहते हैं और यह कि शेष लोग आपको ईमानदार समझते रहें। ताकि आपको अन्य लोगों से कोई खतरा नहीं हो। भले ही अन्य लोगों के हक मारने में आप उस्ताद हों।....चुप क्यों हो गए। बंधुवर कहने और आचारण में लाने में बहुत फर्क होता है। आप दूसरे से जिस आचरण की अपेक्षा रखते हैं, वहीं आचरण आप खुद करने से क्यों कतराते हैं। इसलिए कि इसमें भौतिक फायदा कम और मेहनत ज्यादा है। सादगी ज्यादा और ऐयाशी कम है। अब आपको लगेगा कि यह लेखक हमें उपदेश देने की कोशिश कर रहा है। यह खुद कितना ईमानदार है, जो सबसे ऐसे सवाल कर रहा है? यदि आपके मन में यह सवाल उठा तो बुरा न मानें-बल्कि खुद को किसी न किसी स्तर के भ्रष्टचार का समर्थक मान लें। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो निश्चित तौर पर समझ लें कि आपके अंदर भ्रष्टाचार का प्रवेश हो चुका है, जिसके दुष्प्रभाव से इस समाज कोई अन्य नहीं बचा सकता।
यानी, इसी तरह से हम भ्रष्टाचार के गुलाम होते जाएंगे और एक दिन हमारे समाज पर भ्रष्टाचार का राज होगा, और जो सबसे ज्यादा भ्रष्टाचारी होंगे वही इस समाज पर राज करेंगे।....वर्तमान में भ्रष्टाचार के प्रति भारत रूपी समाज के शासक, प्रशासक और जनता की जैसी प्रतिक्रिया है, उसे देखकर तो भ्रष्ट भारतीय समाज की कल्पना करना मुश्किल नहीं लगता।....
....तो क्या वाकई में हम ऐसा ही चाहते हैं ? प्रतिदिन के अखबार, न्यूज चैनलों के बुलेटिन भ्रष्टाचार की खबरों से जो भरे रहते हैं, उन्हें देखकर क्या आपको मजा आता है? अफसोस नहीं होता? यदि होता है तो क्यों नहीं इसका प्रतिकार करते हैं। कहेंगे आप अकेले क्या कर सकते हैं। आप खुद को तो भ्रष्टाचार से मुक्त कर सकते हैं। कोई अनैतिकता, बेईमानी, कर्तव्यविमुखता छोटी नहीं होती है, उसी को छोड़कर आप भ्रष्टाचार का प्रतिकार कर सकते हैं। सच का दामन थाम कर हो सकता है, कुछ दिनों आपको थोड़ी दिक्कत हो, पर प्रतिकार इतना आसान नहीं होता, उसके लिए दिक्कत सहना ही पड़ेगा। ऐसा करना एक आंदोलन करने जैसा ही है। यदि ऐसा ज्यादातर लोग करने लगे तो कल्पना कीजिए क्या अपने समाज में भ्रष्टाचार का वर्चस्व कभी जम पायेगा....नहीं न। तो फिर आप किस दिशा में जाना चाहते हैं भ्रष्टाचार की ओर या आचार की ओर। समाज के ऐसे किसी नेता, कार्यकर्ता, प्रशासक, कर्मचारी, व्यापारी, एजेंट से कोई ऐसा काम नहीं करवाये, जिसके लिए वह भ्रष्ट तरीके अपनाता हो। घूस लेने व देने वालों का प्रतिकार करें। आपकी नजर में खराब नेताओं को किसी भी शर्त या लालच या डर में वोट नहीं दें।
क्या हम ऐसा कर सकते हैं? यह सवाल भी काफी महत्वपूर्ण है। पिछले साठ सालों की बेफिक्र जीवन ने हमारे दिल-दिमाग पर कई तरह की बुराइयों के परत जमा दिये हैं और वे हमारे लिए आम बात हो चुकी हैं। ऐसे में उन बुराइयों का प्रतिकार करना आसान नहीं है। ऐसे में, इसके दंश झेल रहे लोगों पर नजर डालें। लंबी लाइन में ईमानदारी से घंटों खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करने वाले उन साधारण आदमी को देखें, जिनकी बारी का हक मारकर आप अपनी पहुंच और पहचान के बल पर लाइन तोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। आप कहेंगे, यह सब नहीं करने से तो समय पर आपका कोई काम ही नहीं होगा, फिर तो आप समाज में पीछे रह जाएंगे।...तो क्या लाइन में खड़े लोग को आगे नहीं बढ़ना है?...यदि हां, तो थोड़ा कम आराम कीजिए।
आप अपने घर-परिवार के लिए इतनी मेहनत करते है, तो क्या उस समय में से दस-पांच मिनट दूसरे के लिए भी नहीं दे सकते। ऐसा करके देखिएगा, बदलाव आपके सामने दिखेगा और उससे जितनी खुशी और आनंद आपको मिलेंगे, उतना कार पर लांग ड्राइव लेने, यारों के साथ बियर की बोतले गटकने से भी नहीं होगा।
भाई साहब...यदि इंसानियत और मानवता का आनंद और भी आसानी से प्राप्त करना हो तो मेरा एक सुझाव चाहें तो मान सकते हैं-यह सुझाव मैं निजी अनुभव के आधार पर दे रहा हूं-मानना न मानना आपकी इच्छा पर निर्भर है, क्योंकि इंसानियत और मानवता का आनंद उठाने के रास्ते अनेक हैं, पर सबके मूल में एक ही परमात्मा है। क्योंकि सबका मालिक एक ही है। और मैं इस परम वाक्य के वक्ता और परमात्मा के प्रवक्ता, करूणा के अवतार बाबा साईनाथ की शरण में जाने और उनका अनुसरण करने की आपसे आग्रह करता हूं। भारत रूपी समाज को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए मुझे लगता है कि बाबा की भक्तिमार्ग को अपनाना सबसे सरल रास्ता है।
Sunday, October 10, 2010
यह मानवीयता क्या चीज है...
एक अंतहीन सी भूल भलैया में उलझा है
औपचारिकताओं से लदा यह समय
जहां दरअसल
आगे बढना और ज्यादा उलझते जाना है
तार्किकता से दूर
गणित का सिर्फ यही बचता है
हमारे मनसों में
संख्याएं हमें कहीं का नहीं छोड़ती
वे हमें गिनने की मशीनों में तब्दील कर देती हैं
जोड़ बाकी लगाते हुए
हमारे लिए हर चीज सिर्फ साधन हो जाती है
और लगातार इसकी आवृत्ति से
धीरे धीरे हमारे साध्यों में
पता ही नहीं चलता
इस तरह चीजों में ही उलझे हुए हम
खुद एक चीज में तब्दील हो गये हैं
औऱ बाजार के नियमों से
संचालित होने लगे हैं
बच्चे अब रोज ही अक्सर पूछते हैं
यह मानवीयता क्या चीज हैं..
क्या आपको पता है ये
मानवीयता क्या चीज है...
औपचारिकताओं से लदा यह समय
जहां दरअसल
आगे बढना और ज्यादा उलझते जाना है
तार्किकता से दूर
गणित का सिर्फ यही बचता है
हमारे मनसों में
संख्याएं हमें कहीं का नहीं छोड़ती
वे हमें गिनने की मशीनों में तब्दील कर देती हैं
जोड़ बाकी लगाते हुए
हमारे लिए हर चीज सिर्फ साधन हो जाती है
और लगातार इसकी आवृत्ति से
धीरे धीरे हमारे साध्यों में
पता ही नहीं चलता
इस तरह चीजों में ही उलझे हुए हम
खुद एक चीज में तब्दील हो गये हैं
औऱ बाजार के नियमों से
संचालित होने लगे हैं
बच्चे अब रोज ही अक्सर पूछते हैं
यह मानवीयता क्या चीज हैं..
क्या आपको पता है ये
मानवीयता क्या चीज है...
Thursday, September 23, 2010
अयोध्या किसकी.................
5 मुकदमे...30 पक्षकार...और देशभर की संवेदनाएं से जुडा अयोध्या उर्फ श्रीराम जन्म भूमि उर्फ बाबरी मस्जिद......24 को आने वाले ये फैसला 1 हफ्ते के टल गया ............500 सालों से चर्चित तथा 1850 से चले आ रहे देश के इस सबसे बडे विवादित फैसले पर सबकी नज़र टिकी हुई है.....।बडी लंबी जद्दोजहद के बाद अदालत ने इस बार इस विवादित मामले पर फैसला देने की ठानी है....।अदालत को ना सिर्फ इस मामले पर फैसला देना है बल्कि तकरीबन 150 साल पहले अंग्रेजों1885-86में दिये फैसले पर विचार करेगी.........।अयोध्या मामले पर अभी तक कुल 4 मुकदमे विचाराधीन है.इनमें से तीन मामले हिंदु पक्ष के है और एक मामला मस्लिम पक्ष की तरफ से है....।500 साल पहले 1528 में अयोध्या में एक मस्जिद बनी लोगों का मानना है कि इस जगह पर श्री राम का जन्म हुआ था....इस मस्जिद को बाबर ने यहां बनवाया था....मस्जिद के निर्माण के 300 सालों बाद पहली बार इस जगह में 1853 में सांप्रदायिक दंगे हुए ......।तनाव के हाताल देखते हुए ब्रिटिश शासन ने 1859 मे इस जगह पर बाड लगा दी और भीतरी हिस्से पर में हिंदुओ को पूजा करने और बाहरी हिस्से में मुसलमानों को नमाज अदा की इजाजत दे दी...।1949 में इस जगह पर भगवान राम की मूर्तिया पाई गयी और विवाद बढने लगा जिस पर सरकार ने तुरंत कार्यवाई करते हुए विवादित स्थल पर ताला लगा दिया......।लंबे समय तक यह मुद्दा लोगों के दिलों में बैठा रहा और 6 दिसंबर 1992 को कारसेवको द्वारा मस्जिद को गिरा दिया गया....।
अयोध्या इतिहास के पन्नों पर.....
बाहदुर शाह आलमगीर की पौत्री ने 17 -18 शताब्दी के मध्य एक किताब सफीहा-ए-चलह लिखी थी इस किताब के जानकार मिर्जा जान के मुताबिक ....."मथुरा,बनारस औऱ अवध के काफिरों के इबादतगाह जिन्हे वे गुनहगार और काफिर कन्हैया की पैदाइगाह,सीता की रसोई और हनुमान की यादगार मानते हैं....इस्लाम की तकात के आगे यह सब नेस्तेनाबूद कर दिय गए और इन सब मुकामों पर मस्जिदें तामीर करवा दी गई है....।" के रूप में बताया है......तो वहीं हदीका-ए-शहदा के मुताबिक 1855 में वाजिद अली शाह के जमाने में हनुमान गढी को हिंदुओं के कब्जे से वापिस लेने के लिए अमीर अली असेठनी के नेतृत्व में किये गये संघर्ष का विवरण मिलता है....।इसी किताब के अध्याय 9 में इस जगह को राम के वालिद की राजधानी बताया गया है...।जहां पर एक बड़ा मंदिर होना बताया गया है।इसी जगह पर सीता की रसोई जिसे आज भी सीता पाक के नाम से जाना जाता है का भी जिक्र है...।
विवाद की जड क्या......
हिंदुओं का मानना है कि इस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था....जिसे साबित करने के लिए विश्व हिंदु परिषद् ने 1990 में इतिहासकारों एवं पुरात्तववेत्ताओ के लेखों के साथ ही कई तरह के आकंडे और नक्शों के साथ रिकार्ड भी पेश किया.....।तो मुस्लिम पक्षकारों का कहना है 1528 से लेकर 1885 तक के आंकडों के अनुसार यहां पर मुस्लिमों का हकहै। विवाद के शरूआत में तो मुद्दा केवल उन मूर्तियों का था जो मस्जिद के आंगन में पहले से ही रखीथी...जिन्हे दोबारा वहां पर स्थापित किया जाये। जैसे जैसे विवाद बढता गया मंदिर और मस्जिद के दायरे भी बढते गये.....शरूआत में इस मुकदमें कुल 23 प्लाट शामिल थे जिनका रकबा कम था....लेकिन 1993 के बाद इस विवाद को हल करने के लिए मंदिर मस्जिद दोनो को बनवाने केलिए मस्जिद समेत 70 एकड जमीन अधिग्रहीत कर ली गई है।
अब तक के अदालती फैसले....
अब तक अदालत से आये फैसलों मे ंसबसे पहले1950 में फैजाबाद कोर्ट ने रामलला की मूर्तियां हटाने अथवा पूजा में हस्तक्षेप पर रोक लगा दी।मंहत रघुवरदास ने जन्मभूमि पर एक चतुबरे के निर्माण की मांग की थी.... जिसे फैजाबाद अदालत ने खारिज कर दिया था।1955 में पूजा स्थल में ताला लगा दिया ....औऱ पुनः1986 को अदालत ने ताला खोलने के आदेश दिये।1994 मे सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी राय देने से इंनकार कर दिया क्या वहां कोई मंदिर तोडकर मस्जिद बनाई गईथी। और फिर मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट को सौप दिया गया।
अयोध्या इतिहास के पन्नों पर.....
बाहदुर शाह आलमगीर की पौत्री ने 17 -18 शताब्दी के मध्य एक किताब सफीहा-ए-चलह लिखी थी इस किताब के जानकार मिर्जा जान के मुताबिक ....."मथुरा,बनारस औऱ अवध के काफिरों के इबादतगाह जिन्हे वे गुनहगार और काफिर कन्हैया की पैदाइगाह,सीता की रसोई और हनुमान की यादगार मानते हैं....इस्लाम की तकात के आगे यह सब नेस्तेनाबूद कर दिय गए और इन सब मुकामों पर मस्जिदें तामीर करवा दी गई है....।" के रूप में बताया है......तो वहीं हदीका-ए-शहदा के मुताबिक 1855 में वाजिद अली शाह के जमाने में हनुमान गढी को हिंदुओं के कब्जे से वापिस लेने के लिए अमीर अली असेठनी के नेतृत्व में किये गये संघर्ष का विवरण मिलता है....।इसी किताब के अध्याय 9 में इस जगह को राम के वालिद की राजधानी बताया गया है...।जहां पर एक बड़ा मंदिर होना बताया गया है।इसी जगह पर सीता की रसोई जिसे आज भी सीता पाक के नाम से जाना जाता है का भी जिक्र है...।
विवाद की जड क्या......
हिंदुओं का मानना है कि इस जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था....जिसे साबित करने के लिए विश्व हिंदु परिषद् ने 1990 में इतिहासकारों एवं पुरात्तववेत्ताओ के लेखों के साथ ही कई तरह के आकंडे और नक्शों के साथ रिकार्ड भी पेश किया.....।तो मुस्लिम पक्षकारों का कहना है 1528 से लेकर 1885 तक के आंकडों के अनुसार यहां पर मुस्लिमों का हकहै। विवाद के शरूआत में तो मुद्दा केवल उन मूर्तियों का था जो मस्जिद के आंगन में पहले से ही रखीथी...जिन्हे दोबारा वहां पर स्थापित किया जाये। जैसे जैसे विवाद बढता गया मंदिर और मस्जिद के दायरे भी बढते गये.....शरूआत में इस मुकदमें कुल 23 प्लाट शामिल थे जिनका रकबा कम था....लेकिन 1993 के बाद इस विवाद को हल करने के लिए मंदिर मस्जिद दोनो को बनवाने केलिए मस्जिद समेत 70 एकड जमीन अधिग्रहीत कर ली गई है।
अब तक के अदालती फैसले....
अब तक अदालत से आये फैसलों मे ंसबसे पहले1950 में फैजाबाद कोर्ट ने रामलला की मूर्तियां हटाने अथवा पूजा में हस्तक्षेप पर रोक लगा दी।मंहत रघुवरदास ने जन्मभूमि पर एक चतुबरे के निर्माण की मांग की थी.... जिसे फैजाबाद अदालत ने खारिज कर दिया था।1955 में पूजा स्थल में ताला लगा दिया ....औऱ पुनः1986 को अदालत ने ताला खोलने के आदेश दिये।1994 मे सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी राय देने से इंनकार कर दिया क्या वहां कोई मंदिर तोडकर मस्जिद बनाई गईथी। और फिर मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट को सौप दिया गया।
Monday, September 20, 2010
इन हाथों में साथ रहने की लकीरें ही कम थी...
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