Saturday, February 6, 2010
विलुप्त की कगार पर भाषाएं
Tuesday, February 2, 2010
शिक्षा का अधिकार:पार्ट 2
कहां पर है कमी:
मध्यप्रदेश में शिक्षा आज भी उन चुनावी मुद्दों में शामिल है जिसे कभी पूरा नहींकिया जाता है। वर्ष 2015 तक प्रदेश के सभी बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा सुनिश्चित करवाना है। प्रदेश के गठन के 52 साल बाद भी शतप्रतिशत बच्चों को स्कूल तक लाने की कवायद ही चल रही है। मगर प्रदेश के लाखों बच्चों के नसीब में शिक्षा की लकीर नजर नहीं आती है। तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूल छोड़ चुके ढाई लाख बच्चों को दोबारा स्कूल पहुंचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। डाइस की रिपोर्ट के आंकड़े खुद ब खुद इसकी हकीकत बयां करते हैं। चौंकाने वाले तथ्य तो यह हैं कि वर्ष 2000-01 में स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों में से सिर्फ दस फीसदी ही स्कूल छोडक़र जाते थे जबकि वर्ष 2006 तक स्कूल छोडने वाले बच्चों का प्रतिशत 20 के करीब पहुंच गया। नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 17 जिलों में 59012 बाल मजदूर हैं जिनमें से सिर्फ 19072 ही स्कूल जा रहे हैं। इसी तरह इंडस योजना के तहत 5 जिलों के 73119 बाल मजदूरों में से मात्र 28184 को स्कूल में नामांकित बताया जा रहा है। इनके हक में किए जा रहे प्रयासों की पोल खोलने के लिए बैतूल का उदाहरण काफी है जहां 5000 से यादा बाल मजदूर होने पर भी इनके लिए कोई ब्रिज स्कूल आज तक नहीं खुला है। नर्मदा घाटी के विस्थापित परिवारों के हजारों बच्चे हों या पालपुर कूनो के विस्थापित 27 गांवों के बच्चे, सबकी निगाहें आने वाली सरकार पर हैं जो उन्हें स्कूल की सूरत दिखाएगी। होशंगाबाद के पास रानीपिपरिया के सपेरा समुदाय के किसी भी बच्चे को स्कूल में दाखिला नहीं दिया जाता है। सागर के पथरिया गांव की बेड़नी समुदाय की लड़क़ियों को स्कूल में इसलिए अपमानित होना पड़ता है क्योंकि उनके समुदाय की महिलाएं वेश्यावृत्ति करती हैं। पारदी समुदाय को समाज ने अपराधी मान लिया है। इनके बच्चों को स्कूल में ही अपराधी होने का बोध कराया जाता है।2007 के बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण में इस बात का जिक्र था कि ''प्रदेश की सभी 81 हजार 335 प्राथमिक शालाओं को भवन उपलब्ध करा दिए गए हैं। वर्ष 2006-07 मे 2 हजार 284 शालाओं के लिए भवन स्वीकृत होने के पश्चात् कोई भी शासकीय शाला भवनविहीन नहीं हैं।'' जबकि प्रदेश में कई प्राथमिक शालाएं अभी भी भवनविहीन हैं। डाइस रिपोर्ट (2007 में जारी) के मुताबिक 6239 प्राथमिक शालाएं भवनविहीन हैं। इस रिपोर्ट में 2006 तक के आंकड़ें हैं पर सभी प्राथमिक शालाओं को अभी भी भवन उपलब्ध नही कराया जा सका है, जैसा कि सरकार का दावा है। प्रदेश में अभी भी सैकड़ों प्राथमिक शालाएं भवनविहीन हैं। प्रदेश के 10 जिलों में प्राथमिक व मिडिल स्तर की 401 शालालों में मध्यप्रदेश शिक्षा अभियान हस्तक्षेप कर शिक्षा की स्थिति का आकलन कर रहा है। इनमें 332 प्राथमिक शालाएं हैं। इन प्राथमिक शालाओं में शिक्षा गारंटी शाला एवं उन्नयन की हुई शिक्षा गारंटी शालाओं का हिस्सा 40 फीसदी बैठता हैं। यह चिंतनीय तथ्य है कि 401 शालाओं में एकल शिक्षकीय शालाओं का प्रतिशत 23 फीसदी है। आदिवासी बहुल 5 जिले जिलों (धार, झाबुआ, सिवनी, सीधी एवं छिंदवाड़ा) के 237 स्कूलों में एकल शिक्षक शालाओं का हिस्सा 34.2 (81 शालाएं) फीसदी हैं जिनमें लगभग 50 फीसदी हिस्सा (40 शालांए) शिक्षा गारंटी शालाओं का है। 5 जिलों की 81 एकल शालाओं में 4964 बच्चे दर्ज है।1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार अच्छी शिक्षा के लिए 30 बच्चों पर एक शिक्षक लगाया जाना जरूरी है एवं छात्र शिक्षक अनुपात 1:30 रखे जाने की अनुशंसा की गई है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत यह अनुपात 1:40 कर दिया गया है। शाला में 1:40 के अनुपात में शिक्षक नियुक्ति एवं प्राथमिक शाला में कम से कम 2 शिक्षक, माध्यमिक शाला में कक्षावार एक शिक्षक नियुक्त किए जाने का प्रावधान सर्व शिक्षा अभियान के तहत तय है। अफसोसजनक स्थिति है कि उपरोक्त पांच जिलों में 4964 बच्चे एकल शिक्षक शाला में दर्ज होकर बदतर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर है। डाईस प्रतिवेदन 2008 के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर एकल शिक्षक शालाओं का प्रतिशत 22.12 हैं। यानी 19405 शालाओं में एक-एक शिक्षक नियुक्त है। इन प्राथमिक शालाओं में दर्ज बच्चों का प्रतिशत 19.04 है अर्थात कक्षा 1 से 5 में दर्ज लगभग 21460595 बच्चों की पढ़ाई एकल शिक्षक शाला में की जाती है। यह चौंकाने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2004-05 में एकल शिक्षक शालाओं में पढ़ने वाले बच्चों का प्रतिशत 17.7 था, जो वर्ष 2005-6 में 19 प्रतिशत तक बढ़ गया। वर्ष 2004-05 में 100 से ज्यादा बच्चों पर एक शिक्षक के औसत वाली शालाओं का प्रतिशत 4.7 था जो वर्ष 2005-6 में 6 प्रतिशत हो गया।
क्या किया जाये कि बच्चे ज़रा स्कूल जायें
उपरोक्त तथ्तों के आधार पर कहा जा सकता है कि धार, झाबुआ, सिवनी, सीधी,मंड़ला एवं छिंदवाड़ा जैसे पिछड़े ज़िलों पर अभी भी शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार और तकनीकी रूप से कार्य करने की आवश्यकता है।ऐसे प्रत्येक जिलों में एक शिविर का आयोजन करते हुए गांव के शिक्षित वर्ग को आगे आने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। साथ घर की महिलाएं जो बच्चे की पहली शिक्षक होती है को ज्यादा से ज्यादा शिक्षित और सही मायनों में साक्षर किया जाये ताकि बच्चे की साक्षर होने की शुरूआत को सही दिशा मिल सके।उन इलाकों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया जाये जहां पर अभी विकास के नाम पर महज रोजगार गांरटी योजना जैसी योजनाओं का ही क्रियान्वयन किया गया है। अभी इन जिलो में अभी ऐसे कई गांव हैं जहांपर पढ़ने जाने केलिए कई किमी का सफर छात्रों को करना पड़ता है। इन जिलों में जाकर प्रशासन से मिलकर इनकी इस दुविधाओं को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए । हर स्कूल में मौजूद शिक्षका के सामान्य ज्ञान और उनकी जागरूकता को जाचां और परखा जाना चाहिए ताकि कक्षा में मौजूद छात्र के सर्वागिंक विकास का आधार तर किया जा सके।बच्चों का मन कोमल होता है वे जिस तरह का माहौल अपने आसपास देखते हैं उसी के अनुरूप ख़ुद को ढ़ाल लेते हैं,यह माहौल ही बच्चों के भविष्य का निर्णायक होता है।..अगर शिक्षा को सही मायनों में इन आदिवासी जिलों के बच्चों के लिए कारगर बनाना है तो इन आदिवासियों जिलों के पहुँचविहीन इलाकों में जाकर वातावरण को शिक्षा के योग्य बनानेकी कोशिश की जानी चाहिए। ज्यादा से ज्यादा कोशिश की जाये किबच्चों के लिए स्कूल महज़ मध्यान भोजन और समय बिताने का कमरा ना हो बल्कि यह उनके लिए उनके भविष्य को संवारने का एक माध्यम बन सके। स्कूल से घर और घर से स्कूल तक का सफर बच्चे के लिए उसके स्वणिम भविष्य का रास्ता हो.....।
शिक्षा का अधिकार
Education shouldn't be a profit earning business: Chidambaram
“मातृ-भाषा में यदि शिक्षा की धाराप्रशस्त न हो तो इस विद्याहीन देश में मरुवासी मन का क्या होगा” गुरुदेव
विश्व स्तर पर आज हमारा भारत देश हर तरह से संपन्न और प्रगतिशील माना जाता हैं .आज देश ने आकाश से बढ़कर ब्रह्माण्ड को छुने में कामयाबी हासिल की हैं.लेकिन इस पूरे प्रगतिशील दौर में आज भी देश में शिक्षा का स्तर पहले अधिक चिंता जनक बना हुआ है।आज भले ही हमारे पास हर एक किलोमीटर पर स्कूल और पाठशालाएं मौजूद हों लेकिन शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जारहा है।आज दौर में भले ही हमने ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल में दाखिला दिला दिया हो लेकिन शिक्षा के पैमानों में इन बच्चों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो गई है. देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा का बिल भले ही पास हो गया हो लेकिन यह आधारभूत अधिकार अभी भी केवल कागजों पर ही है। वर्ष 2002 में संविधान बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देना को फंडामेंटल राइट में शामिल किया था। इसकी तरह काफी बहस के बाद 2009 अगस्त में शिक्षा का अधिकार बिल भी लोकसभा में पास कर दिया था। लेकिन कई महीने बाद भी इन दोनों को लेकर अधिसूचना जारी नहीं की जा सकी। जब तक इस बिल को लेकर अधिसूचना जारी नहीं हो जाती, तब तक यह इस बिल का कोई मतलब नहीं है।
स्कूली शिक्षा की समस्याओं पर विचार करने के सिलसिले में जो कुछ प्रश्न बार-बार उठाए जाते हैं वे हैं- शिक्षकों कीअनुपस्थिति, अभिभावकों की उदासीनता, सही पाठय़क्रम का अभाव, अध्यापन में खामियां इत्यादि। परंतु इन समस्याओं को अलग-अलग रूप में देखा नहीं जा सकता, क्योंकि इनकी जड़ें सारी व्यवस्था में फैली हैं। इसलिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाना जरूरी है। इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं पर गौर करना होगा। पहली मूल समस्या है प्रवेश (ऐक्सेस) की कमी। आजादी के 62 साल बाद भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं
पूरे देश में यह संख्या 30 प्रतिशत से कम नहीं होगी। दाखिले का अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेशियो) सूचक नहीं हो सकता। क्योंकि दाखिल बच्चों में से अधिकांश विभिन्न कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। आधुनिकतम सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कक्षा 10 तक पहुंचते-पहुंचते 61 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। प्रवेश की समस्या के समाधान के लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए - अतिरिक्त स्कूलों का निर्माण, अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली और अतिरिक्त शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों का निर्माण। शिक्षा की दूसरी मूल समस्या है, इसकी अति निम्न गुणवत्ता। इसे बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है न्यूनतम मानकों (नौर्म्स) का निर्धारण कर उन्हें सभी स्कूलों में लागू करना। शिक्षा अधिकार विधेयक की अनुसूची में कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। परंतु ये नितान्त अपर्याप्त हैं। अनेक अत्यावश्यक मानकों का इसमें जिक्र ही नहीं है जैसे- जन आबादी से स्कूल की दूरी, प्रति स्कूल और प्रति क्लास में छात्रों की संख्या, कक्षाओं में फर्नीचर, पाठय़-उपकरण, प्रयोगशाला का स्तर, शिक्षकों की योग्यता, प्रशिक्षण, वेतनमान एवं सेवा की शर्ते इत्यादि। कुछ मानकों का जिक्र तो है पर उनका स्पष्ट उल्लेख करने के बदले कहा गया है, ‘जैसा सरकार निर्धारित करे।’ इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अयोग्य शिक्षकों (पैरा टीचर्स) की बहाली और बहु कक्षा पढ़ाई का मौजूदा सिलसिला जारी रहेगा। फिर तो गुणवत्ता की बात करना भी फिजूल है।
प्रवेश एवं गुणवत्ता, इन दोनों समस्याओं का असली कारण है वित्त का अभाव। शिक्षा अधिकार विधेयक से संलग्न वित्तीय स्मरण-पत्र में कहा गया है, ‘विधेयक को अमल में लाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का परिणाम निर्धारित करना फिलहाल संभव नहीं है।’ यह कथन गलत है। पिछले 10 वर्षो में भारत के हर बच्चे को नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने में जो खर्च होगा उसका कई बार अनुमान लगाया जा चुका है। 1999 में तापस मजूमदार समिति ने बताया कि इसके लिएअगले 10 वर्षो में 1,37,000 करोड़ अतिरिक्त रकम लगेगी। 2005 में शिक्षा-परामर्श बोर्ड (केब) के एक विशेषज्ञ दल ने अनुमान लगाया था कि इस पर 6 साल तक प्रतिवर्ष न्यूनतम 53,500 करोड़ और अधिकतम 73 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय होगा। फिलहाल प्रारंभिक शिक्षा के लिए सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में करीब दोगुनी वृद्धि के बाद भी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वशिक्षा अभियान के लिए प्रतिवर्ष करीब 30,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इस रकम से न तो देश के सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाया जा सकता है और न गुणवत्ता में विशेष परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था की तीसरी मूल समस्या है, इसमें व्याप्त असमानता और भेदभाव। देश के सामाजिक वर्गीकरण के साथ-साथ हमारे यहां स्कूलों का भी वर्गीकरण है, जिसके मुताबिक धनी और विशिष्ट वर्ग के बच्चे ज्यादा फी वाले अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, और गरीब व निम्न वर्ग के बच्चे जिनकी संख्या कुल स्कूली छात्रों का करीब 80 प्रतिशत है। इसके चलते देश का सामाजिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है। सभी स्कूलों में न्यूनतम मानक लागू करना न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद भेदभाव को मिटाने में भी मदद कर सकता है। भेदभाव मिटाने का दूसरा उपाय है पड़ोस के स्कूल के सिद्धांत को लागू करना जिसके मुताबिक हर स्कूल को उसके लिए निर्धारित पोषक क्षेत्र अथवा पड़ोस के सभी बच्चों को दाखिला देना होगा। इसका भी शिक्षाधिकार विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि, स्कूलों के वर्तमान वर्गीकरण को कायम रखने की व्यवस्था है।
देश के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार देने के बाद सरकार अब माध्यमिक शिक्षा का अधिकार भी देने जा रही है। मानव संसाधन विकास के अनुसार आने वाले पाँच वर्षों में माध्यमिक शिक्षा को भी बच्चों के मौलिक आधार के रूप में शामिल किया जा सकता है। जिसके तहत बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी अनिवार्य व मुफ्त होगी। उल्लेखनीय है कि संसद ने पहले ही 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा बिल पारित किया था। इसके तहत शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार बन गई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक 2013 या 2015 तक सरकार बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी मुफ्त व अनिवार्य कर सकती है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून को लागू करने में सरकार को पाँच साल में एक लाख 71 हजार 484 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे और पाँच लाख दस हजार शिक्षकों को भर्ती करना पड़ेगा। इसी वर्ष 27 अगस्त को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून भारत के गजट में प्रकाशित हो गया। लेकिन अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है।
हालांकि देश के 86वां संविधान संशोधन के अनुच्छेद 21(क) में शिक्षा को जोड़कर मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 आयु समूह के बच्चों तक सीमित कर दिया था। यह बिल इसी अनुच्छेद के तहत लाया गया है। वर्ष १९५0 में जब संविधान ने सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने के निर्देश दिए थे,तब के सामाजिक-आर्थिक हालात आज से एकदम अलग थे। आज १२वीं कक्षा की परीक्षा पास किए बगैर रोजगार की बात तो दूर, आईटीआई व पॉलीटेक्निक या फिर अन्य किसी व्यावसायिक कोर्स में भी दाखिला नहीं मिल सकता, तो फिर देश के बच्चों को आजादी के बाद हर साल इंतजार करवाकर कौन-सा मौलिक अधिकार दिया जा रहा है?
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) का सिद्धांत लागू करने की नीति बन चुकी है। यानी अब सार्वजनिक धन का उपयोग सरकार शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के लिए करने जा रही है। कुछ प्रदेश सरकारों ने तो सरकारी स्कूलों को निजी कंपनियों को देने के लिए टेंडर तक जारी करने या फिर अन्य तरीकों से सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है।अप्रैल2009 में योजना आयोग ने स्कूली शिक्षा को सार्वजनिक-निजी सहभागिता के सांचे में ढालने के लिए एक बैठक बुलाई थी, जिसमें १८ कॉपरेरेट घरानों के प्रतिनिधि मौजूद थे, एक भी शिक्षाविद् या शिक्षक नहीं था। शिक्षा को कारोबार में बदलने की इस घोषित सरकारी नीति के चलते इस बिल का खोखलापन अपने आप जाहिर हो जाता है।
वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीति की तर्ज पर बने इस सरकारी बिल के पैरोकार सरकार के बाहर भी हैं। उनका कहना है कि यह बिल निजी स्कूलों की भी जवाबदेही तय करता है। उनका इशारा उस प्रावधान की ओर है, जो निजी स्कूलों में कमजोर वर्गो और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करता है। इनकी फीस सरकार की ओर से दी जाएगी। इससे बड़ा फूहड़ मजाक और क्या हो सकता था। एक, आज 6-14 आयु समूह के लगभग 20 करोड़ बच्चों में से ४ करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनके 25 फीसदी यानी महज एक करोड़ बच्चों के लिए यह प्रावधान होगा। शेष बच्चों का क्या होगा? दूसरा, सब जानते हैं कि निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा अन्य कई प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं, जिसमें कम्प्यूटर, पिकनिक, डांस आदि शामिल है। यह सब और इन स्कूलों के अभिजात माहौल के अनुकूल कीमती पोशाकें गरीब बच्चे कहां से लाएंगे? इनके बगैर वे वहां पर कैसे टिक पाएंगे? तीसरा, यदि किसी तरह वे 8वीं कक्षा तक टिक भी गए, तो उसके बाद उनका क्या होगा? ये बच्चे फिर सड़कों पर आ जाएंगे जबकि उनके साथ पढ़े हुए फीस देने वाले बच्चे १२वीं कक्षा पास करके आईआईटी व आईआईएम या विदेशी विश्वविद्यालयों की परीक्षा देंगे। इन सवालों का एक ही जवाब था- समान स्कूल प्रणाली जिसमें प्रत्येक स्कूल (निजी स्कूलों समेत) पड़ोसी स्कूल होगा।
सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले (1993) के अनुसार अनुच्छेद ४१ के मायने हैं कि शिक्षा का अधिकार 14 वर्ष की आयु में खत्म नहीं होता, वरन सैकंडरी व उच्चशिक्षा तक जाता है। फर्क इतना है कि 14 वर्ष की आयु तक की शिक्षा के लिए सरकार पैसों की कमी का कोई बहाना नहीं कर सकती, जबकि सैकंडरी व उच्चशिक्षा को देते वक्त उसकी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा जा सकता है। जनता को उम्मीद थी कि यह बिल उच्चशिक्षा के दरवाजे प्रत्येक बच्चे के लिए समानता के सिद्धांत पर खोल देगा। तभी तो रोजगार के लिए सभी समुदायों के बच्चे बराबरी से होड़ कर पाएंगे और साथ में भारत की अर्थव्यवस्था में समान हिस्सेदारी के हकदार बनेंगे। क्या ऐसे कानून के लिए और आधी सदी तक इंतजार किया जाए या संसद पर जन-दबाव बनाकर इसी बिल में यथोचित संशोधन करवाने के लिए कमर कसी जाए?
इन सभी सरकारी आंकड़ों से शिक्षा की कार्यशैली से तो आम जनता को भ्रमित किया जा सकता है ।पर शिक्षा के लिए शिक्षायोजना अधिकार का क्रियांवयन होना जरूरी है.सिर्फ शिक्षा का मौलिक अधिकार का कानून सरकारी दस्तावेजों से ही नहीं मिल सकताहै। सरकारी और गैर सरकारी संगठनो को अब जड़ चेतनके साथ जुडकर शुरूआत करनी होगी। आम जनता की भागीदारी के लिए मीड़िया को भी सामने आना होगा लोगों को जागरूक और प्रोत्साहित करना होगा।मध्य प्रदेश के उन जिलों में जहां शिक्षा का स्तर आज भी न्यूनतम है लोगों को शिक्षा के बढते दायरें में शामिल करने की आवश्यकता है।शिक्षा के इस अधिकार को पूरी तरह से सफल बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है...
1. शिक्षित युवाओं को शिक्षक बननेकी राह में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए एवं उचित ट्रेनिंग और आय देना चाहिए।
2. सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में अधिक गुणवत्ता के साथ शिक्षा की उचित व्यवस्था पर केंद्रित होना चाहिए।
3. इस चुनौती को जन भागीदारी,मीड़िया, और गैर सरकारी संगठनों द्वारा एक साथ मिलकर किया जाना चाहिए।
4. सिर्फ शहरों और जिलो तक ही सीमित ना रह कर गांवों और छोटे कस्बों तक शिक्षा के सही मायनों को पहुचाना होगा।शिक्षा नीति के सही क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
Friday, January 29, 2010
अंध विश्वास और हम
अंध विश्वास और हम
आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग टोना-टोटके, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से जकड़े हुए हैं
ऐसा कोई भी नहीं है जो किसी बुरी नज़र की बात से ना ड़रे क्या छोटा और क्या बड़ा...
अंध-विश्वास की इस दौड़ में एक और नाम शामिल हो गया है....पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी का … भ्रष्ट्राचार के कई मामलों से घिरे जरदारी एक बार फिर अंधविश्वास के चलते मुसीबत में घिरते नज़र आ रहे हैं...राष्ट्रपति बनने के बाद से जरदारी ने खुद को बुरी नज़र से बचाने के लिए 500से भी ज्यादा काले बकरों की बलि दे दी है....जरदारी रोज़ सुबह एक काले बकरे की बलि देते है ताकि वे किसी भी तरह की बुरी नज़र और जादू से बच सके..इतना ही नहीं इस अंधविश्वास के चलते जरदारी सिर्फ ऊंठ और बकरी का ही दूध पीते हैं।...ऐसा नहीं है कि इस अंधविश्वास की चपेट में सिर्फ जरदारी ही शामिल हों पूरी दुनिया में ऐसे कई राजनेता और विश्व प्रसिद्ध हस्तियां हैं जिन्होंने खुद को इस तरह के तमाम अंधविश्वासों में खुद को लपेट रखा है...इन हस्तियों के बारे में जानने से पहले एक नज़र ड़ालते हैं कौन से ऐसे टोटके हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को दहशत की चपेट में ड़ाल रखा है...
बिल्ली के रोने की आवाज- परेशानी आने की सूचना मिलना।
-काम पर जाते समय छींकना- काम न बनना।
- पूजा करते समय दीपक बुझना- अपशगुन होना।
- खाने में बाल आना- किसी परेशानी में आना।
- रोटी का बार-बार मुड़ना- किसी अपने का याद करना।
- छत पर कौवे का बोलना- मेहमान के आने की सूचना।
और भी ना कितने तरह के टोटके हैं जिनसे लोग डरते हैं...। पूरी दुनिया में एक नज़र डाले तो तमाम बड़े नाम किसी ना किसी शकुन और अपशकुन के चलते अंध विश्वास की चपेट में रहेहैं...
बात चाहे जरदारी की हो या फिर ओबामा की कहीं ना कहीं हर कोई इन अंध विश्वासों की चपेट में है,एक नज़र इनके अंध विश्वास पर......
· जॉन मेक -इन भी इसी अंधविश्वासों की दौड़ में शामिल हैं .वे हमेशा अपने साथ एक लकी सिक्का ,निकल (धातु ),quarter ,कम्पस ,और एक पंख साथ में रखते हैं .
· वही अमेरिका के बरैक ओबामा वोटिंग के पहले बास्केटबाल खेलने की परंपरा निभाते हैं .
· Franklin Roosevelt को १३ नम्बरों में अन्धविश्वास से इतने गहरे प्रभावित रहे हैं की महीने की १३ तारीख को कही सफ़र नहीं करते थे .वे अपनी यात्रा १२ या १४ के आंकडे में करते थे,इसके साथ उन्हें यह भी भ्रम था की एक ही माचिस से तीन सिगरट नहीं जलना चाहिये .
· Harry S .Truman जो united states के ३३ वे राष्ट्रपति रह चुके हैं.वे अपने घर के बाहर घोड़े की नाल टांगते हैं.ऐसा माना जाता है कि घोड़े की नाल घर के मुख्य दरवाजे पर टांगने से घर में समर्धि और सुख-शांति बनी रहती हैं. जब वे राष्ट्रपति बने तो अपने राष्ट्रपति भवन के मुख्य द्वार पर भी घोड़े की नाल टांग रखी थी .
· Michelle Obama की पत्नी परम्परिक choclate cookies बनाने की प्रतिस्पर्धा में हार गयी थी ,तो सबने उनकी हार निश्चित कर ली थी .पर वे इलेक्शन जीत गए थे.
· Bill Clinton ने अंतिम इलेक्शन के दौरान अपनी रेसिपी जमा कर दी थी,वही उनकी पत्नी पीछे रह गयी थी .ऐसा माना गया कि इसकी वजह से बिल क्लिंटन इलेक्शन जीत गए थे.
सिर्फ विदशों में ही नहीं भारत में तो राज नेताओं और बड़ी हस्तियों पर अंध विश्वास की किताब लिखी जा सकती है.।कुछ बड़े नाम हैं.....
वाइ एस राजशेखर रेड्डी जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो अंकज्योतिष के अनुसार ३ जून तक अपने चम्बर में नहीं गए थे .क्योंकि हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से उस दिनननिर्जला एकादशी थी ,जो अशुभ मानी जाती हैं.उन्होंने पूजा पाठ के बाद ही ७;१५ a .m पर ही अपनी कुर्सी पर बैठे थे.उन्होंने भगवन बैकंटेश्वर गिरजाघर और मुसलिम धर्म के अनुसार पूजा अर्चना भी की थी.इसके बाद अपने अच्छे राजनीती कार्यकाल के लिए हनुमान मंदिर में पूजा के बाद ही कार्य शुरु किये थे .उसी दिन ८ मंत्रियो ने अंकज्योतिष के अनुसार ठीक ९ बजे से पहले अपने चम्बर में गए थे।ज्योतिष्य शास्त्री भैयु महाराज के शिष्य विलासराव देशमुख ,शिवराज पाटिल ,जयंत राव पाटिल,औऱ अशोक च्वहाण इन्हीं के कहे अनुसार कार्य रूपरेखा बनाते हैं.....तो वहीं बाल ठाकरे को धार्मिक अनुष्ठान खासकर यज्ञ एवं आहुतियों में विश्वास है उनका मानना है कि इससे ही राजनीति में एक मुकाम तय किया जा सकता है। देवी गौड़ा भी अंकज्योतिष्ती में विश्वाश करतेहैं। मुसीबतों से बचने के लिए देवीगोड़ा एक जुदाई चैन भी पहनते थे। उमा रेड़्ड़ी तो अपने आफिस में जाने से पहले नारियल तोड़ना नहीं भूलती थी ...
इतना ही नहीं इस अंध विश्वास की दौड में हमारे फिल्मी सितारे भी पीछे नहीं है अगर हम फिल्मी हस्तियों की बात करें तो बिग बी ने अभिषेक की शादी के पहले ऐश्वराया की कुंड़ली में मांगलिक दोष को दूर करने के लिए वाराणसी मे 4 घंटे की पूजीकी थी,...।- एकता कपूर अपने हर सीरियल का नाम क से शुरू करती है। काला टीका लगा कर रखती हैं साथ ही अपने आफिस के बाहर एक मरा हुआ चूहा लटकाकर रखा है । भारतीय क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर उल्टा पैड पहले पहनते हैं। स्टीव वॉ अपनी जेब में हमेशा लाल रूमाल रखते थे।अपनी हर फिल्म के मुहुर्त से पहले हेमा मालिनी इडली-चटनी खाती थी।टोटकों का चलन पुराना और अंधविश्वास से जुडा है। मगर हैरत की बात तो यह भी है कि अनेक विश्व विख्यात लेखक भी इन पर यकीन करते थे और लेखन के समय इनका नियमित रूप से पालन करते थे, जो बाद में उनकी आदत में शुमार भी हो गया। महान फ्रांसीसी लेखक एलेक्जेंडर डयूमा का विचार था कि सभी प्रकार की रचनाएं एक ही रंग के कागज पर नहीं लिखनी चाहिए। उनके मुताबिक उपन्यास आसमानी रंग के कागज़ पर और अन्य रचनाएं गुलाबी रंग के कागज़ पर लिखनी चाहिए।मगर प्रख्यात हिन्दी लेखक रांगेय राघव को फुलस्केप आकार का कागज भी बेहद छोटा लगता था। इसी तरह चार्ल्स आउडिलायर (1821-1867) नामक फ्रेंच कवि को हरा रंग लिखने की प्रेरणा देता था। इसलिए उन्होंने अपने बाल ही हरे रंग में रंग डाले थे। प्रख्यात समीक्षक डॉ.सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज पर बिठाकर ही लिख पाते थे। गार्डन सेल्फिज शनिवार को दोपहर में और शेष दिनों में रात के समय लिखते थे। शनिवार को दोपहर में वह खुद को विशेष उत्साहित महसूस करते थे।विख्यात अंग्रेजी उपन्यासकार और समीक्षक मैक्स पैंबर सिर्फ सुबह दस बजे तक ही लिखते थे। इसलिए एक उपन्यास को पूरा करने में उन्हें बहुत ज्यादा समय लगता था। इटली के लेखक जियो ऑक्चिनी रौसिनी (1791-1868) लिखने का मूड बनाने के लिए हमेशा नकली बालों की तीन विग पहना करते थे। प्रसिध्द जर्मन कवि फेडरिक वान शिल्लर (1759-1805) की आदत भी कम अजीब नहीं थी। वे अपने पैरों को बर्फ के पानी में डुबोकर ही कविताएं लिख सकते थे। अगर वे ऐसा नहीं करते थे तो उन्हें कविता का एक भी शब्द नहीं सूझता था।फ्रांसीसी भाषा के सुप्रसिध्द साहित्यकार तथा रमणी रसिक चिरकुमार मोंपासा मूड फ्रैश होने पर ही लिखते थे। अपने को तरोताजा करने के लिए वे नाव चलाते, मछलियां पकड़ते या फिर मित्रों के साथ हंसी-ठिठौली करते थे। राइज एंड फास्स ऑफ रोमन एंपायर के लेखक नाटककार गिब्सन को लिखने के लिए पहले एकाएक संजीदा होना पडता था। महान फ्रांसीसी लेखक बाल्लाजाक की आदत भी विचित्र थी। वह दिन में फैशन के कपड़े पहनते और रात को लिखते समय पादरियों जैसा लिबास पहनते थे।सुप्रसिध्द लेखक बरटेड रसेल का अपनी लेखन प्रक्रिया के बारे में कहना था कि उनका लेखन मौसम पर ही आधारित होता है। खुशगवार मौसम में वे रात-दिन लिखते थे और गर्मी वाले उमस भरे दिन में वे लिखने से कतराते थे। एईडब्ल्यू मेसन भी मूडी स्वभाव के थे। जब उनका मन करता तभी लिखने बैठते। वे रात या दिन मूड होने पर कभी भी लिख सकते थे।गोल्जस्मिथ को लिखने से पहले सैर करने का भी शौक था। अपने उपन्यास, कविताएं और नाटक रचने के दौरान उन्होंने दूर-दराज के इलाकों की यात्रा की। गिलबर्टफे्रंको सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक लिखा करते थे। दोपहर के भोजन के बाद एक घंटे लिखते थे और फिर वह शाम को भी दो घंटे तक लिखते थे। रात को लिखना उन्हें जरा भी पसंद नहीं था। सर ऑर्थर पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था। दिन में अगर वे लिखने बैठते तो उन्हें कुछ सूझता ही नहीं था। इसी तरह की आदत लुई पार्कर को भी थी। वे दिनभर सोते और रात को जागकर लिखते थे। अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन को औंधे मुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी।अर्नेस्ट हेमिंगवे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूमो और पंजाबी के उपन्यासकार नानक सिंह को खडे होकर लिखने की आदत थी। विस्मयली लैक्स सुबह चार बजे से दिन के 11 बजे तक और शाम को साढे सात बजे तक तथा रात को फिर 11 बजे तक लिखते थे। उनका बाकी का समय सोने और चाय पीने में बीतता था। प्रख्यात रूसी लेखक फीडिन ने जब उपन्यास असाधारण ग्रीष्म ऋतु लिखा तब वह समुद्र किनारे रह रहे थे। उनका मानना था कि समुद्र की लहरों की गूंज की आवाज उन्हें निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती थी।हैरसवासिल सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को पांच बजे से सात बजे तक लिखते थे। डेलिस ब्रेडकी केवल तीन घंटे ही लिखते थे और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक। सर ऑर्थर कान डायल केवल सुकून महसूस करने पर ही लिखते थे। अगर किसी बात से उनका मन जरा भी विचलित होता तो वे एक पंक्ति भी नहीं लिख पाते थे। जर्मनी के कार्लबेन को लिखने की प्रेरणा संगीत से मिलती थी। उन्होंने अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड कर रखे थे। पहले वे टेप चलाते और फिर लिखने बैठते।
केशव आचार्य
