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Wednesday, May 18, 2011

मलीहाबादी दशहरी....आम

मौसम की मार के कारण इस साल भले ही आम आदमी और आम के बीच दूरियां कुछ बढ़ जाएं, लेकिन खास आमों में शुमार किया जाने वाला मलीहाबादी दशहरी इस बार कुछ ज्यादा ही खास हो गया है। अब इसके नाम पर आपको कोई भी ऐरा-गैरा आम नहीं भिड़ाया जा सकेगा। ऐसा करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इस आम को अब जीआई (जियॉग्रफिकल इंडिकेशन) टैग से लैस कर दिया गया है। यह एक किस्म का बौद्धिक संपदा अधिकार या पेटेंट है।

मलीहाबादी दशहरी आम अपनी लज्जत और खुशबू के कारण पूरी दुनिया में मशहूर है। जब भी आम की किस्मों का जिक्र होता है, इसका नाम पूरे अदब से लिया जाता है। लेकिन हकीकत यह भी है कि इसकी खासियतों के कारण ही इसके नाम पर पैसा कमाने की होड़ भी देश में जमकर चल रही है। आम आदमी सामान्य दशहरी और मलीहाबादी दशहरी में फर्क नहीं कर पाता और अक्सर ठग लिया जाता है। इसे जीआई टैग मिलने के बाद अब किसी भी आम को मलीहाबादी दशहरी आम कहकर बेचा नहीं जा सकेगा।

जीआई टैग

इसे जीआई टैग, मानकों पर खरा उतरने पर चेन्नै स्थित जियॉग्रफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ऑफिस ने दिया है। यह टैग दिलाने में नैशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड, गुड़गांव और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की इकाई संेट्रल इंस्टिट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉट्रिकल्चर, लखनऊ की अहम भूमिका रही है। इन्होंने इस आम को पैदा करने से लेकर इसकी एक-एक खासियत की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। यह टैग मिलने से मूल वृक्ष की किस्म के आम मलीहाबाद इलाके की आबोहवा में पैदा किए जाने पर ही मलीहाबादी दशहरी आम कहलाएंगे।

इस कारण मूल वृक्ष की किस्म के आम को देश या दुनिया के किसी दूसरे क्षेत्र में उगाने पर उसे मलीहाबादी दशहरी आम नहीं कहा जा सकेगा। इससे मलीहाबाद के किसानों को बेवजह प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा। इससे जहां उन्हें उनकी मेहनत का पूरा मूल्य मिल सकेगा, ग्राहक को भी असली आम मिलेगा। मलीहाबादी दशहरी जब बाजार में आएगा तो उस पर जीआई टैग लगा होगा। किसी और किस्म पर यह टैग लगा होने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

मलीहाबाद में दशहरी आम पैदा करने वाले किसानों का एक संगठन है जो इसकी क्वॉलिटी पर नजररखता है। जीआई टैग मिलने के बाद अब अगर किसी किसान का आम मानकों पर खरा नहीं उतरातो उससे मलीहाबादी दशहरी बेचने का हक छीन लिया जाएगा। 

बॉक्स 

कहां है मूल वृक्ष 
मलीहाबादी दशहरी आम का मूल वृक्ष कोई 150 साल पुराना है। यह उत्तर प्रदेश की मलीहाबादतहसील के काकोरी ब्लॉक के दशहरी गांव में आज भी मौजूद है। यह गांव लखनऊ से 14 किलोमीटरदूर लखनऊ हरदोई हाइवे पर है। मूल वृक्ष की ऊंचाई 10 मीटर है और इसका तना तीन मीटर मोटाहै। पिछले दस साल से यह हर साल 79 से 189 किलो आम दे रहा है। इसी पेड़ से पैदा हुए आम केपेड़ मलीहाबादी दशहरी को उसकी खास पहचान देते हैं।

Saturday, April 23, 2011

कायदे कानून बदले बिना सचिन को भारत रत्न देना संभव नहीं

देश के तमाम खिलाड़ी, नेता और चाहने वाले भले ही मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग कर रहे हों लेकिन संबंधित कायदे कानून बदले बिना उन्हें इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नहीं नवाजा जा सकता।देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न 1954 में शुरू किया गया था। तब से अब तक 41 व्यक्तियों को इससे विभूषित किया जा चुका है लेकिन इनमें से कोई भी खिलाड़ी नहीं है, वजह संबंधित नियम हैं।संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है, ‘‘फिलहाल वह :सचिन: इसमें :भारत रत्न देने के लिए: फिट नहीं बैठते। जब तक इन्हें :नियमों को: बदला नहीं जाता वह फिट नहीं बैठते।’’ नियमों के मुताबिक भारत रत्न, ‘‘यह सम्मान कला, साहित्य और विज्ञान के विकास में असाधारण सेवा के लिए तथा सर्वोच्च स्तर की जन सेवा की मान्यतास्वरूप दिया जाता है।’’ इसमें खेल का जिक्र कहीं नहीं है जबकि पद्म पुरस्कारों के संबंधित नियमों के तहत ‘यह पुरस्कार सभी प्रकार की गतिविधियों, क्षेत्रों जैसे कि कला, साहित्य और शिक्षा, खेल कूद, चिकित्सा, सामाजिक कार्य, विज्ञान और इंजीनियरी, सार्वजनिक मामले, सिविल सेवा, व्यापार और उद्योग आदि में विशिष्ट और असाधारण उपलब्धियों, सेवाओं के लिए प्रदान किये जाते हैं।’ इसी कारण सचिन को नियमों के तहत सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिया जा चुका है।संविधान विशेषज्ञ कश्यप का कहना है ,‘‘यह निर्णय सरकार को करना होगा कि क्या खेल को भारत रत्न में जोड़ा जाए। गृह मंत्रालय को इस तरह का एक प्रस्ताव मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष रखना होगा।’‘ कश्यप ने कहा, ‘‘सरकार की तरफ से गृह मंत्रालय पहल कर सकता है। अगर कोई संसद सदस्य या कोई भी नागरिक गृह मंत्रालय को पत्र लिखता है तो मंत्रालय उस पर संज्ञान ले सकता है। वैसे वह :मंत्रालय: भी स्वयं संज्ञान ले सकता है।
मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद नियमों में संशोधन कर गृह मंत्रालय सचिन ही नहीं बल्कि किसी भी खिलाडी को भारत रत्न देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अपने प्रशंसकों के बीच ‘क्रिकेट का भगवान’ माने जाने वाले सचिन को भारत रत्न देने की मांग संसद ही नहीं विधानसभाओं में भी बार . बार उठ चुकी है। हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में सर्वसम्मति से यह मांग की गई थी।
भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य महेंद्र सिंह धोनी, हरभजन सिंह, युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग जैसे मौजूदा खिलाड़ियों सहित कई पूर्व क्रिकेटर सचिन को भारत रत्न देने की मांग कर चुके हैं।
जहां पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया काफी लंबी है वहीं भारत रत्न के लिए कोई औपचारिक सिफारिश की जरूरत नहीं है। संबंधित नियमों के मुताबिक, ‘‘भारत रत्न के लिए सिफारिश स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति को की जाती है। इसके लिए कोई औपचारिक सिफारिश की आवश्यक नहीं है।’’हालांकि केन्द्र में मंत्री रह चुके और उच्चतम न्यायालय के वरिषष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनखड़ के मुताबिक सरकार चाहे तो बिना नियम बदले भी लोक सेवा वर्ग के तहत किसी को भारत रत्न पुरस्कार दिया जा सकता है। भारत रत्न में खिलाड़ियों का वर्ग शामिल नहीं होने की बात पर उन्होंने कहा, ‘‘यह :संशोधन: प्रक्रिया न तो जटिल है और ना ही अव्यावहारिक।’’ 
sabhar bhasha

Wednesday, April 13, 2011

विवाहः हिंदू विकृति का उत्सववादी चेहरा

विवाह उत्सव भारतीय समाज में इस हद तक विकृत हो चुका है कि उसे किसी भी तरह का बढ़ावा देना सामाजिक अपराध से कम नहीं है। विशेष कर हिंदुओं में यह विकृति सारी सीमाएं लांघ गई है। दुखद यह है कि अन्य धर्मावलंबियों में भी, जातिवाद की तरह ही, हिंदू विवाह की बुराईयां फैलती जा रही हैं। इससे भी ज्यादा अफसोस और चिंताजनक यह है कि समाज में बढ़ती शिक्षा और समृद्धि ने इस विनाशक प्रथा को कम करने की जगह इसका विस्तार ही किया है।
यह दो व्यक्तियों के मिल कर नया जीवन शुरू करने का फैसला या दो परिवारों के बीच नये संबंधों की शुरूआत का उत्सव न हो कर अनावश्यक दिखावा और क्षमता से ज्यादा खर्च के अवसर में बदल गया है। बुरी बात यह है कि यह वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष के दोहन और शोषण का एक स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था बन गया है। यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि हिंदू समाज में इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियों का दमन, उत्पीडऩ, हत्याएं और आत्म हत्याएं इसी आडंबर से जुड़ी हैं। युवतियों की आकस्मिक मौत का एक बड़ा कारण दहेज से जुड़ी समस्याएं हैं जो मध्यवर्ग से निकल कर निम्र वर्ग तक पहुंच गई हैं। लड़कों का विवाह उनके परिवारों के लिए खड़े-खड़े समृद्ध बन जाने का माध्यम हो चुका है। सच तो यह है कि पिछली कम से कम डेढ़ शताब्दी से विवाह प्रसंग की खराबियों की समस्याएं भारतीय समाज को उद्वेलित किए हुए हैं और औपनिवेशिक दौर से ही भारतीय विवाह परंपरा को सुधारने की कोशिश की जाती रही है। आजादी के बाद तो सरकार ने बाकायदा दहेज लेने पर पाबंदी और लड़कियों के पैतृक संपत्ति पर अधिकार के कानून बनाए हैं पर ये मात्र कागजी बन कर रह गए हैं। आज भी शिक्षित और कमाऊ लड़कियों तक को कम दहेज के कारण प्रताडऩा सहनी पड़ती है। सच यह है कि विवाह की बुराईयों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में न तो सरकार की ओर से और न ही समाज की ओर से कोई ऐसा प्रयत्न नजर आता है जो इसे रोकने की कोशिश हो। विवाह को लेकर किसी तरह का कोई नियंत्रण या पाबंदी कहीं भी लागू नहीं की जाती। उल्टा उदारीकरण के बाद के वर्षों में विवाह एक बड़े उद्योग में बदल गया है और इस अनुत्पादक और समाज विरोधी गतिविधि में तेजी आई है। जो काम कभी छोटे-मोटे स्तर पर होते थे वह अब बड़े व्यावसायिक आयोजन में बदल गए हैं। असल में प्रेम विवाह या युवकों को चुनाव के अधिकार से वंचित रखने का एक बड़ा कारण दहेज और विवाह से जुड़ा यह तामझाम ही है। स्वयं युवकों द्वारा इस विकृत तौर-तरीके को परंपरा और गौरव कह कर इसका आग्रह करना मूलत: दिखावे के अलावा लालच भी है।
इस विकृति को किस तरह से बढ़ावा मिल रहा है उसका उदाहरण हमारे बड़े व्यावसायिक अखबार हैं जिनमें विवाह के दिखावे और आडंबर को लगातार महिमामंडित किया जाता है। पिछले दो दशक में हिंदू परिवारों ने देश विदेश में कुछ इस तरह की शादियां की हैं जो अपने बेतहाशा और बेहूदे खर्च के लिए बहुचर्चित रही हैं। अफसोस की बात यह है कि इनकी भत्र्सना किसी भी अखबार ने गलती से भी नहीं की है।
सवाल यह है कि इस सामाजिक कुरीति के बारे में राजनेताओं का क्या कहना है? जैसा कि चलन है जबानी तौर पर इसका बस विरोध करते हैं पर आपको कभी भी ऐसा देखने को नहीं मिलेगा कि इस तरह के विवाहों का सक्रिय तौर पर कहीं भी विरोध किया जा रहा हो। संभवत: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जो नीतिगत तौर पर विवाह में सादगी की हिमायत करता है। उससे इसकी अपेक्षा इसलिए भी की जाती है कि यह स्वयं को हिंदुओं की सबसे बड़ी हिमायती बतलाती है। ये पार्टियां असल में किसी संप्रदाय के राजनीतिक हितों का उस तरह से पक्ष नहीं लेतीं जिस तरह की वे बातें करती हैं बल्कि इसके बहाने संप्रदाय विशेष का एक वर्ग सत्ता हथियाने के लिए इसे आड़ के रूप में इस्तेमाल करता है। साफ है कि हिंदुओं या उस तरह से किसी भी संप्रदाय की हिमायती पार्टी का एक मात्र काम उसके राजनीतिक हितों की ही रक्षा न तो होना चाहिए और न ही हो सकता है। उसके सामाजिक उत्थान का काम भी तो उसी पार्टी का है या होना चाहिए। पर यथार्थ में क्या होता है? इसका सबसे ताजा उदाहरण भारतीय जनता पार्टी है।
उसके अध्यक्ष नितिन गडकरी के बेटे का विवाह है, दिसंबर के पहले सप्ताह में हुआ था। उस विवाह में क्या हुआ, यह देखना जरूरी है।
यह विवाह उसी विदर्भ (नागपुर) में हुआ जहां कि पिछले कुछ वर्षों में हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सन 1997 से अब तक अकेले महाराष्ट्र में 44,276 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। सिर्फ 2009 में ही इस राज्य में आत्महत्या करनेवाले किसानों की संख्या 2,872 थी। इन में से अधिकांश आत्महत्याएं विदर्भ क्षेत्र में ही हुईं। असमानता और गरीबी का आलम यह है कि इस क्षेत्र में कुपोषण और भुखमरी इतनी ज्यादा है कि उसकी तुलना सिर्फ मध्य प्रदेश से ही की जा सकती है। देखने की बात यह है कि यह उसी महाराष्ट्र का हिस्सा है जो भारत के समृद्धतम राज्यों में से है। इस असमानता ने यहां बेचैनी फैलाई हुई है और आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में माओवादी आंदोलन सक्रिय है। पर इससे नेताओं और राष्ट्रवाद की दुहाई देनेवाली पार्टी का क्या लेना-देना। शादी तो शादी की तरह ही होगी ना। आखिर हिंदू परंपरा और संस्कृति का मसला है। इस लिए भाजपा के अध्यक्ष महोदय श्रीमान नितिन गडकरी जी के सुपुत्र निखिल के विवाहोत्सव के निमंत्रण पत्रों की कीमत ही एक करोड़ के आसपास थी। दावत तीन हिस्सों में हुई। पहली परिवार के निकट के लोगों के लिए थी, जिसमें दो हजार लोग थे, विशिष्ट लोगों के लिए हुई दूसरी दावत में देश भर से 15 हजार लोगों के शामिल होने का अनुमान रहा। 4 दिसंबर को जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए हुए तीसरे आयोजन में पूरा शहर ही आमंत्रित था। एक अखबार के अनुसार इसके लिए एक लाख तो निमंत्रण पत्र ही भेजे गए थे।
इस विवाह पर कितना खर्च हुआ होगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 3 दिसंबर को हुई सिर्फ विशिष्ट लोगों की पार्टी पर ही पांच करोड़ खर्च होने का अनुमान है। इसमें 70 किस्म के व्यंजन परोसे गए थे। हेमा मालिनी जैसे नौ सौ लोगों को देश भर से आने-जाने के लिए हवाई टिकट दिए गए थे। दिल्ली में कई पत्रकारों को भी मुफ्त के टिकट मिले (जो भी जानते हैं कि उनका जन्म सिद्ध अधिकार है)। सारा महाराष्ट्र और विशेषकर विदर्भ बिजली की कमी से त्राहि-त्राहि कर रहा है। किसानों को सिंचाई के लिए बिजली नहीं मिल पा रही है और लोगों को रोशनी करने के लिए पर चार दिन तक नागपुर शहर का जर्रा-जर्रा विवाह की खुशी में जगमगाता रहा (किस के हिस्से की बिजली से, आप समझ ही गए होंगे)। कम से कम अनुमान लगाएं तो भी इस पर दस करोड़ रुपये तो खर्च हुए ही होंगे। मोटे अनुमान से भी इन पार्टियों में 25 करोड़ के आसपास तो खर्च किया ही गया होगा। देखने की बात यह है कि गडकरी उन उद्योगपतियों में से हैं जिनका उत्थान उदारीकरण की लहर में पिछले दो दशकों में ही हुआ है। (अगर सरकार कह रही है कि अर्थिक वृद्धि की दर दो अंकों के निकट पहुंचनेवाली है तो कोई गलत तो है नहीं! इससे कोई और बड़ा प्रमाण हो सकता है।)। पिछले दशक में हुई एक लाख आत्म हत्याओं की बात छोडिय़े, विवाह की यह भव्यता और कितने लोगों के लिए प्रेरणा का कारण बनेगी, उसका अनुमान लगाईये। और वह प्रेरणा कितनी और मासूम युवतियों की हत्या करवाएगी और कितनों को आत्म हत्या के कगार पर ले जाएगी जरा उसकी सोचिए!
इस खर्च का एक और पहलू भी है। इसमें भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और मंत्रीगणों के अलावा केंद्र के कई नेता भी शामिल हुए। ये नेता वहां किस तरह पहुंचे यह जानना भी कम मजेदार नहीं है। अरुण जेटली और लालकृष्ण अडवाणी चार्टर्ड एयर बस 320 से पहुंचे, रमेश पोखरियाल निशंक, शिवराज सिंह चौहान, रमण सिंह, नरेंद्र मोदी, यदुरप्पा, सुखबीर सिंह बादल विशेष विमानों से पहुंचे। इन में से कई अपने उदार उद्योगपति मित्रों के विमानों में आये (राजनेताओं और उद्योगपतियों के बीच के भाई चारे के, राडिया टेपों के बहाने, सामने आए आदर्श किस्सों से आज भला कौन अपरिचित है!) जैसे कि नरेंद्र मोदी अडाणी समूह के निजी जेट से पहुंचे तो येदुरप्पा बंगलुरू की एक कंपनी के जहाज में। इनके अलावा अनिल अंबानी, कुमार मंगलम बिड़ला, वी. धूत, विजय माल्या आदि उद्योगपतियों ने अपने निजी विमानों का इस्तेमाल किया। इसी तरह राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, वरुण गांधी आदि भी पहुंचे। कुल मिला कर उस दिन नागपुर के हवाई अड्डे पर 30 से ज्यादा निजी और चार्टर्ड जहाज उतरे जिनमें से, जाहिर है कि वे मेहमान उतरे जो निखिल के विवाह के अवसर पर हो रहे भोज में शामिल होने आए थे। अगर गडकरी ने अपने बेटे के विवाह में करोड़ों खर्च किए तो क्या ऐरे-गैरे फटीचर चले आते! उन्होंने भी अवसरानुकूल रकम लगाई थी। वह क्या हो सकती है इसका अनुमान अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक के 20 दिसंबर के अंक में छपे जहाजों को किराए पर लेने की दरों से कुछ हद तक लगाया जा सकता है। इसके अनुसार सामान्यत: आठ-नौ सीटों वाले जहाजों का किराया प्रति घंटे दो से पौने तीन लाख तक होता है। दिल्ली से अगर नौ सीटर चैलेंजर नामक जहाज को लिया जाए और इसके आने जाने के समय व इंतजार के समय को जोड़ा जाए – छह घंटा उड़ान और चार घंटा प्रतीक्षा – तो कुल किराया 30 लाख से ऊपर बैठता है। बोईंग 320 का क्या किराया रहा होगा, अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि यह बड़ा विमान होता है और इसके बारे में पत्रिका के लेख में कुछ नहीं कहा गया है।
देखने की बात यह है कि नागपुर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी मुख्यालय है जो हिंदुओं का स्वयं को सबसे बड़ा ठेकेदार बतलाता है पर लगता है उसका एजेंडा हिंदू समाज मेें किसी तरह का सुधार न हो कर सिर्फ उसकी रूढि़वादिता को भुनाना और हिंदुओं में असुरक्षा पैदा कर देश के विभिन्न समुदायों के प्रति घृणा फैलना है।
यह अजीब संयोग है कि गडकरी के लड़के के विवाह के कुछ ही दिन बाद वाराणसी में गंगा की आरती के दौरान, एक धमाका हुआ जिसमें एक मौत हुई और कई घायल हुए। देखने की बात यह थी कि उसी घटना स्थल पर एक डेढ़ वर्ष की लावारिस बच्ची मिली जो बम धमाके से ज्यादा अपने मां-बाप के खो जाने से दहशत में थी। पुलिस आतंकवादियों का सुराग लगाने में अभी तक तो कामयाब नहीं हो पाई है, पर हां उसने बच्ची के मां-बाप का पता लगाने में जरूर सफलता हासिल कर ली है। लड़की हिंदू ही नहीं बल्कि ब्राह्मण परिवार की थी। उसे वहां मां-बाप जान-बूझ कर छोड़ गए थे। क्यों? इसका जवाब गडकरी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक-दूसरे से पूछना चाहिए। संभव है वे किसी सही नतीजे पर पहुंच सकें।
साभार..समयातंर

Saturday, April 9, 2011

जंतर मंतर पर हैं कई अन्ना

दिल्ली के जंतर मंतर पर जाने से लगता है कि देश की हर सड़क अन्ना हज़ारे के धरने के पंडाल पर ख़त्म हो रही हो. लेकिन जंतर मंतर पर अन्य मसलों पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के दरवाज़े पर ये सड़क ज़रा भी नहीं थमती.
आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हज़ारे के स्वास्थ्य पर हर पल नज़र रखी जा रही हैं. सरकारी डॉक्टरों से ले कर निजी डॉक्टरों की एक फ़ौज उनके चारों तरफ़ खड़ी हैं.
अन्ना हज़ारे के पंडाल से बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बैठे हर्ष कुमार भी अन्ना की तरह ही पांच तारीख़ से आमरण अनशन कर रहे हैं लेकिन उनकी सुध कोई नहीं ले रहा.

अकेले लड़ रहे है

हर्ष कुमार का कहना है, "बुधवार शाम को डॉक्टर ने मेरी जांच की थी उसके बाद से कोई देखने नहीं आया न कोई सरकार की तरफ से किसी किस्म की कोई प्रतिक्रिया आई है."

हर्ष कुमार एक पेड़ के नीचे बिना किसी पंखे के तपती ज़मीन पर दरी पर लेटे हुए अब अपने मित्रों और सलाहकारों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि आगे की रणनीति बनाएं. लेकिन हर्ष कुमार कतई नाउम्मीद नहीं हैं उन्हें लगता हैं कि एक दिन अन्ना की तरह उनके साथ भी हजारों लोग होंगें और उनकी बात भी सुनी जायेगी.हर्ष कुमार से पचास फीट की दूरी पर मछिंदर नाथ सूर्यवंशी अखिल भारतीय जूता मारो आंदोलन के झंडे तले पिछले चार साल से जंतर मंतर पर बैठे हैं. मछिंदर नाथ के हाल तो हर्ष कुमार से भी खराब हैं. वो ज़मीन पर ऊपर बिना किसी तम्बू कनात के पेपर पर लेटे हुए हैं.
सूर्यवंशी का माना है कि भूख हड़ताल से कुछ खास हासिल नहीं होने वाला और रिश्वत की जगह जूता मारना ही भ्रष्टाचार का हल है लोकपाल बिल नहीं.

सुध नहीं ली

सूर्यवंशी कहते हैं, "पिछले चार साल में यहाँ जंतर मंतर पर जाने कितने लोगों ने भूख हड़ताल की, कितने लोगों ने जान दे दी, कितने धरने प्रदर्शन आए और चले गए लेकिन कुछ नहीं हुआ.''
जंतर मंतर के एक दूसरे कोने पर दिल्ली नगरपालिका दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी संघ भी धरने पर बैठे हैं लेकिन यहाँ भी कष्ट यही है की न सरकार न मीडिया कोई उनकी बात नहीं सुन रहा.
दिल्ली के जंतर मंतर की तुलना लंदन के हाइड पार्क और न्यू यॉर्क के टाइम स्क्वायर से की जाती है. बरसों से राजनितिक, ग़ैर राजनीतिक संगठन और आम लोग यहाँ आकर धरने प्रदर्शन कर रहे हैं.
बरसों पहले राष्ट्रपति भवन और संसद से कुछ ही दूरी पर दिल्ली का बोट क्लब मैदान प्रदर्शनों की स्थायी जगह थी. लेकिन कुछ बड़ी रैलियों में हुई हिंसा और सुरक्षा कारणों से प्रदर्शनों के अधिकृत रूप से जंतर मंतर के पास सड़क किनारे के फुटपाथ प्रदर्शनों और धरनों के लिए अधिकृत कर दिए गए
सौजन्य....bbc