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Wednesday, June 15, 2011

हमभारत वासी.......

 कन्या भ्रूण हत्या, शिशु हत्या औरमानव तस्करी जैसी घटनाओं के कारण भारत को एक सर्वे में महिलाओं के लिए दुनिया में चौथा सबसे खतरनाक देश माना गया है।

महिला अधिकारों के लिए कानूनी सूचना और कानूनी सहायता केंद्र थॉमसन रॉयटर्स ट्रस्टलॉ विमिन की ओर से कराए गए सर्वे के अनुसार विश्व में अफगानिस्तान महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। इसके बाद डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया का नंबर आता है।

इस सूची के टॉप चार देशों में से तीन दक्षिण एशिया में हैं। इस सर्वेक्षण में इस क्षेत्र के 213 विशेषज्ञों को खतरों से जुड़े विभिन्न फैक्टर को ध्यान में रखते हुए देशों को सूचीबद्ध करने को कहा गया था।

इन एक्सपर्ट्स से देशों को सूचीबद्ध करते समय छह मुख्य खतरों की श्रेणियों को ध्यान में रखने को कहा गया था जिनमें स्वास्थ्य खतरे, यौन हिंसा, गैर यौन हिंसा, संस्कृति, परंपरा अथवा धर्म में पालन की जाने वाली हानिकारक प्रथाओं, आर्थिक संसाधनों तक पहुंच में कमी और मानव तस्करी शामिल है।

सर्वे में कहा गया, 'भारत कन्या भ्रूण हत्या, शिशु हत्या और मानव तस्करी के कारण इस सर्वे में चौथे स्थान पर है।' सर्वे के मुताबिक 2009 में भारत के गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने टिप्पणी की थी कि भारत में कम से कम 10 करोड़ लोग मानव तस्करी में शामिल हैं।

सीबीआई का अनुमान है कि 2009 में करीब 90 प्रतिशत मानव तस्करी देश के अंदर हुई तथा देश में करीब 30 लाख वेश्याएं थीं, जिनमें से 40 प्रतिशत बच्चे थे। अन्य तरह के उत्पीड़नों में जबर्दस्ती श्रम कराना और जबर्दस्ती विवाह शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, 'भारत में माना जाता है कि पिछली सदी में कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के कारण पांच करोड़ लड़कियों का अस्तित्व नहीं रहा।'

Thursday, June 9, 2011

हुसेन: प्रसिद्धि और विवादों से घिरे कलाकार

भारतीय पेंटिंग को ग्लोबल मंच तक पहुंचाने वाले पेंटरमकबूल फिदा हुसेन हिंदू देवी-देवताओं के चित्रण को लेकर कई बार विवादों में घिरे। समकालीन भारतीय कला के पर्याय हुसेन को फोर्ब्स मैगजीन भारत के 'पिकासो की संज्ञा दे चुकी है।

17 सितंबर, 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में जन्मे हुसैन ने पेंटिंग का कहीं से भी विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया था। अपने कला जीवन की शुरुआत उन्होंने मुंबई में फिल्मों के होर्डिंग्स पेंट करके की थी। हुसेन ने एक बार अपने शुरुआती जीवन का जिक्र करते हुए बताया था, हमें प्रति वर्ग फुट के चार या छह आना मिलते थे, जिसका मतलब है कि छह गुणा 10 फुट के कैनवास से हमें कुछ रुपये मिलते थे। 

इतनी कम आय को देखते हुए हुसेन ने दूसरे कामों की भी तलाश शुरू कर दी। इसी दौरान उन्हें खिलौने बनाने के एक कारखाने में काम मिला, जहां उन्हें अधिक राशि मिलने लगी।

हुसेन का हिंदू देवी-देवताओं की पेंटिंग्स को लेकर विवादों से चोली-दामन की तरह का साथ रहा। इसी वजह से उन्हें 2006 में देश भी छोड़ना पड़ा। मां दुर्गा और सरस्वती को लेकर उनकी कलाकृतियों पर हिंदू संस्थाओं ने आपत्ति जताई। इन कलाकृतियों को लेकर उठे विवाद के बाद 1998 में उनके घर पर हिंदू संगठनों ने हमला बोलते हुए उनकी कलाकृतियों की तोड़-फोड़ दिया।

फरवरी, 2006 में हुसेन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरों को लेकर लोगों की भावनाएं भड़काने का आरोप लगा। हुसेन के खिलाफ इस आरोप में कई केस चले। ऐसे ही एक अदालती मामले में उनके खिलाफ गैर-जमानती वॉरंट भी जारी हुआ क्योंकि उन्होंने समन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलीं।

हुसेन ने देश छोड़ने के पहले कहा, कानूनी तौर पर मामले इतने जटिल हैं कि मुझे घर न लौटने की सलाह दी गई है। इस बात की आशंकाएं थीं कि उनके लौटने पर उन्हें उनके खिलाफ चल रहे मामलों को लेकर गिरफ्तार कर लिया जाएगा, इसके बाद भी उन्होंने घर लौटने की इच्छा जताई थी।

हुसेन 1940 के दशक के अंत से ही प्रसिद्धि पा चुके थे। वह 1947 में फ्रांसिस न्यूटन सूजा द्वारा स्थापित प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हो गए। यह ग्रुप भारतीय कलाकारों के लिए नई शैलियां तलाशने और बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा स्थापित परंपराओं को तोड़ने के इच्छुक युवा कलाकारों के लिए बनाया गया था। पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित हुसेन भारत के कलाकारों मेंसबसे ज्यादा धन पाने वाले कलाकारों में से एक रहे। उनकी एक कलाकृति क्रिस्टीज की नीलामी में 20 लाख डॉलर में बिकी। 



स्त्रोत नवभारत टाइम्स

Wednesday, May 18, 2011

मलीहाबादी दशहरी....आम

मौसम की मार के कारण इस साल भले ही आम आदमी और आम के बीच दूरियां कुछ बढ़ जाएं, लेकिन खास आमों में शुमार किया जाने वाला मलीहाबादी दशहरी इस बार कुछ ज्यादा ही खास हो गया है। अब इसके नाम पर आपको कोई भी ऐरा-गैरा आम नहीं भिड़ाया जा सकेगा। ऐसा करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इस आम को अब जीआई (जियॉग्रफिकल इंडिकेशन) टैग से लैस कर दिया गया है। यह एक किस्म का बौद्धिक संपदा अधिकार या पेटेंट है।

मलीहाबादी दशहरी आम अपनी लज्जत और खुशबू के कारण पूरी दुनिया में मशहूर है। जब भी आम की किस्मों का जिक्र होता है, इसका नाम पूरे अदब से लिया जाता है। लेकिन हकीकत यह भी है कि इसकी खासियतों के कारण ही इसके नाम पर पैसा कमाने की होड़ भी देश में जमकर चल रही है। आम आदमी सामान्य दशहरी और मलीहाबादी दशहरी में फर्क नहीं कर पाता और अक्सर ठग लिया जाता है। इसे जीआई टैग मिलने के बाद अब किसी भी आम को मलीहाबादी दशहरी आम कहकर बेचा नहीं जा सकेगा।

जीआई टैग

इसे जीआई टैग, मानकों पर खरा उतरने पर चेन्नै स्थित जियॉग्रफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ऑफिस ने दिया है। यह टैग दिलाने में नैशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड, गुड़गांव और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की इकाई संेट्रल इंस्टिट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉट्रिकल्चर, लखनऊ की अहम भूमिका रही है। इन्होंने इस आम को पैदा करने से लेकर इसकी एक-एक खासियत की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। यह टैग मिलने से मूल वृक्ष की किस्म के आम मलीहाबाद इलाके की आबोहवा में पैदा किए जाने पर ही मलीहाबादी दशहरी आम कहलाएंगे।

इस कारण मूल वृक्ष की किस्म के आम को देश या दुनिया के किसी दूसरे क्षेत्र में उगाने पर उसे मलीहाबादी दशहरी आम नहीं कहा जा सकेगा। इससे मलीहाबाद के किसानों को बेवजह प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा। इससे जहां उन्हें उनकी मेहनत का पूरा मूल्य मिल सकेगा, ग्राहक को भी असली आम मिलेगा। मलीहाबादी दशहरी जब बाजार में आएगा तो उस पर जीआई टैग लगा होगा। किसी और किस्म पर यह टैग लगा होने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

मलीहाबाद में दशहरी आम पैदा करने वाले किसानों का एक संगठन है जो इसकी क्वॉलिटी पर नजररखता है। जीआई टैग मिलने के बाद अब अगर किसी किसान का आम मानकों पर खरा नहीं उतरातो उससे मलीहाबादी दशहरी बेचने का हक छीन लिया जाएगा। 

बॉक्स 

कहां है मूल वृक्ष 
मलीहाबादी दशहरी आम का मूल वृक्ष कोई 150 साल पुराना है। यह उत्तर प्रदेश की मलीहाबादतहसील के काकोरी ब्लॉक के दशहरी गांव में आज भी मौजूद है। यह गांव लखनऊ से 14 किलोमीटरदूर लखनऊ हरदोई हाइवे पर है। मूल वृक्ष की ऊंचाई 10 मीटर है और इसका तना तीन मीटर मोटाहै। पिछले दस साल से यह हर साल 79 से 189 किलो आम दे रहा है। इसी पेड़ से पैदा हुए आम केपेड़ मलीहाबादी दशहरी को उसकी खास पहचान देते हैं।

Saturday, April 23, 2011

कायदे कानून बदले बिना सचिन को भारत रत्न देना संभव नहीं

देश के तमाम खिलाड़ी, नेता और चाहने वाले भले ही मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने की मांग कर रहे हों लेकिन संबंधित कायदे कानून बदले बिना उन्हें इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नहीं नवाजा जा सकता।देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न 1954 में शुरू किया गया था। तब से अब तक 41 व्यक्तियों को इससे विभूषित किया जा चुका है लेकिन इनमें से कोई भी खिलाड़ी नहीं है, वजह संबंधित नियम हैं।संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है, ‘‘फिलहाल वह :सचिन: इसमें :भारत रत्न देने के लिए: फिट नहीं बैठते। जब तक इन्हें :नियमों को: बदला नहीं जाता वह फिट नहीं बैठते।’’ नियमों के मुताबिक भारत रत्न, ‘‘यह सम्मान कला, साहित्य और विज्ञान के विकास में असाधारण सेवा के लिए तथा सर्वोच्च स्तर की जन सेवा की मान्यतास्वरूप दिया जाता है।’’ इसमें खेल का जिक्र कहीं नहीं है जबकि पद्म पुरस्कारों के संबंधित नियमों के तहत ‘यह पुरस्कार सभी प्रकार की गतिविधियों, क्षेत्रों जैसे कि कला, साहित्य और शिक्षा, खेल कूद, चिकित्सा, सामाजिक कार्य, विज्ञान और इंजीनियरी, सार्वजनिक मामले, सिविल सेवा, व्यापार और उद्योग आदि में विशिष्ट और असाधारण उपलब्धियों, सेवाओं के लिए प्रदान किये जाते हैं।’ इसी कारण सचिन को नियमों के तहत सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिया जा चुका है।संविधान विशेषज्ञ कश्यप का कहना है ,‘‘यह निर्णय सरकार को करना होगा कि क्या खेल को भारत रत्न में जोड़ा जाए। गृह मंत्रालय को इस तरह का एक प्रस्ताव मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष रखना होगा।’‘ कश्यप ने कहा, ‘‘सरकार की तरफ से गृह मंत्रालय पहल कर सकता है। अगर कोई संसद सदस्य या कोई भी नागरिक गृह मंत्रालय को पत्र लिखता है तो मंत्रालय उस पर संज्ञान ले सकता है। वैसे वह :मंत्रालय: भी स्वयं संज्ञान ले सकता है।
मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद नियमों में संशोधन कर गृह मंत्रालय सचिन ही नहीं बल्कि किसी भी खिलाडी को भारत रत्न देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अपने प्रशंसकों के बीच ‘क्रिकेट का भगवान’ माने जाने वाले सचिन को भारत रत्न देने की मांग संसद ही नहीं विधानसभाओं में भी बार . बार उठ चुकी है। हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में सर्वसम्मति से यह मांग की गई थी।
भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य महेंद्र सिंह धोनी, हरभजन सिंह, युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग जैसे मौजूदा खिलाड़ियों सहित कई पूर्व क्रिकेटर सचिन को भारत रत्न देने की मांग कर चुके हैं।
जहां पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया काफी लंबी है वहीं भारत रत्न के लिए कोई औपचारिक सिफारिश की जरूरत नहीं है। संबंधित नियमों के मुताबिक, ‘‘भारत रत्न के लिए सिफारिश स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति को की जाती है। इसके लिए कोई औपचारिक सिफारिश की आवश्यक नहीं है।’’हालांकि केन्द्र में मंत्री रह चुके और उच्चतम न्यायालय के वरिषष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनखड़ के मुताबिक सरकार चाहे तो बिना नियम बदले भी लोक सेवा वर्ग के तहत किसी को भारत रत्न पुरस्कार दिया जा सकता है। भारत रत्न में खिलाड़ियों का वर्ग शामिल नहीं होने की बात पर उन्होंने कहा, ‘‘यह :संशोधन: प्रक्रिया न तो जटिल है और ना ही अव्यावहारिक।’’ 
sabhar bhasha