अभी अभी ......


Monday, August 16, 2010

ये आजादी है या गुलामी... सवाल है वल्दियत...

पिछल दिनों एक ब्लाग पर एक लेख मिला आप लोगो के साथ बांटने का मन हुआ साथ में लिंक संलग्न है,विषय इतना गंभीर है कि आप सुधी पाठकों के विचार जरूर व्यक्त होना चाहिए....

जन्मभूमि जननी और स्वर्ग से महान है। मेरा देश- मेरी धरती मेरी मां है... फिर राष्ट्रपिता और राष्ट्रपति जैसे शब्दों का क्या मायना है? अगर मां कहलाने वाली हमारी मातृभूमि का अस्तित्व प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से युगों से कायम है तो क्या हर पांच साल में नया पति (राष्ट्रपति) और कथाकथित आजादी के बाद पिता (राष्ट्रपिता) का क्या औचित्य और इसकी क्या जरूरत... वह भी उस स्थिति में जब प्रेसीडेंट के अनुवाद में राष्ट्राध्यक्ष और आधुनिक भारत के संदर्भ में आधुनिक राष्ट्र के मूलाधार, कर्णधार, शिल्पकार जैसे शब्द मौजूद हैं...

घोटालों, निराशा और आमजन की कीमत पर हो रही राजनीति (इसे सत्ता और शक्ति के लिए गिरोहबाजों की जंग कहें तो ज्यादा बेहतर) के घटाटोप अंधेर में... आधुनिक आजादी के उत्सव की पूर्वसंध्या पर मेरे मन में एक ऐसा सवाल उफन रहा है शायद जिसका जवाब आजाद होने से अब तक या तो मांग नहीं गया है या किसी ने सवाल उठाने की जुर्रत नहीं की है...

देश के चाहे जिस व्यक्ति, दल या तबके को यह शब्द मंजूर हों, लेकिन मेरा मानना है कि मुझे अभी इन शब्दों से आजाद होना बाकी है और उसके बाद गिरोहबाज राजनेताओं से... शायद तब सच्ची आजादी प्राप्त हो जाए...


अधिकारिक टिप्पणी के लिए पधारे...http://kaldevdk.blogspot.com/

Friday, August 13, 2010

क्या जिंदगी है और भूख है सहारा....सारे जहां से अच्छा.....

क्या जिंदगी है और भूख है सहारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा
सौ करोड़ बुलबुले जाने शाने गुलिस्तां थी
उन बुलबुलों के कारण उजडा चमन हमारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा
पर्वत ऊंचा ही सही,लेकिन पराया हो चुका है
न संतरी ही रहा वह,ना पासवां हमारा
गोदी पे खेलती हैं हजार नदियां,पर खेलती नहीं हैं
जो तड़फती ही रहती हैं,कुछ बोलती नहीं हैं,
बेरश्क हुआ गुलशन ,दम तोड के हमारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा
अब याद के आलावा गंगा में रहा क्या है
कितनों ने किया पानी पी पी के गुज़ारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा
मज़हब की फ्रिक किसको और बैर कब करें हम
है भूखी नंगी जनता गर्दिश में है सितारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा
यूनानो,मिश्र,रोमां जो कब के मिट चुके
उस क्यू मे हम खड़े हैं नंबर लगा हमारा
जिंदगी की गाड़ी रेंगती है धीरे धीरे
घर का चिराग अपना ,दुश्मन हुआ हमारा
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा

(बरबस ही याद हो आया फिर भी मेरा देश महान )

Thursday, August 12, 2010

मां

मां संवेदना है,भावना है अहसास है
मां जीवन के फूलों में खुशबू का वास है
मां रोते हुए बच्चे का,खुशनुमा एहसास है
मां मरुस्थल में नदी या मीठा सा झरना है
मां लोरी है,गीत है,प्यारी सी थाप है
मां पूजा कीथाली है,मंत्रों का जाप है
मां आंखों का सिसकता हुआ किनारा है
मां गालों पर पप्पी है,ममता की धारा है
मां झुलसते दिनों में,कोयल की बोली है
मां मेंहदी है,कुंकुम है,सिंदूर है,रोली है
मां त्याग है,तपस्या है,सेवा है,
मां फूंक से ठंडा किया कलेवा है
मां कलम है,दवात है,स्याही है
मां परमात्मा की स्वयं की एक गवाही है
मां अनुष्ठान है,साधना है,जीवन का हवन है
मां जिंदगी मोहल्ले में ,आत्मा का भवन है
मां चूडी वाले हाथों के मजबूत कंधों का नाम है
मां काशी है,काबा है,और चारों धाम है
मां चिंता है ,याद है,हिचकी है
मां बच्चे की चोट पर सिसकी है,
मां चुल्हा,धुंआ,रोटी,और हाथों का छाला है
मां जीवन का कडबाहट में अमृत का प्याला है
मां पृथ्वी है ,जगत है,धुरी है
मां बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है
मां का महत्तव दुनिया में कम  हो नही सकता
मां जैसा दुनिया में कुछ हो नही सकता

(आदरणीय स्व.व्यासजी को विन्रम श्रृद्धांजलि सहित)

कहां पर सबेरा है.....

कदम कदम इतने छल
मिलते हैं पांव को
समझ नहीं आता
जायें किस गांव को
हाथ नहीं सूझ रहा हाथ को
उफ क्या अंधेरा है
सूर्य की कथाएं तो हम सुनते हैं
पर ना जाने कहं सबेरा है